गुरु रविदास जी और शब्द-सुरती योग।।

     ।।गुरु रविदास और शव्द-सुरति योग।।
गुरु रविदास जी ने शव्द और सुरति को भक्ति साधना का आधार मानकर, उसके महत्व को जन-जन तक पहुँचाकर, शूद्र वर्ण के लिए भक्ति और धार्मिक क्रांति का शुभारंभ किया था। उनसे पूर्व ब्राह्मणों ने चमत्कारिक कथाओं का सृजन करके भारतीय जनता को मूर्ख बनाया हुआ था, तिलिस्मी, अय्यारी कथाओं ने उस समय, खूब धूम मचाई हुईं थी, वेदों, पुराणों और उपन्यासों का शोर तो विश्व विख्यात हैं। इन रचनाओं का मुख्य लक्ष्य केवल मानव को ऊँच-नीच छुआछूत तिलस्मी अय्यारों की अय्यारी,परियों देवियों की कल्पित, भयावाह,  चमत्कारपूर्ण कथाओं से मनोरंजन कराना था, और भूत प्रेतों से जनता को डरा धमका कर रखना ही ब्राह्मण लेखकों का मुख्य काम था। उस समय काल्पनिक झूठी मूठी कथाओं, कहानियों से तो सारी सारी रात महफ़िल जमी रहती थी, जो निरूद्देश्य ही होती थी। गुरु रविदास जी ने, जनता को अपनी काव्य रचनाओं और सत्संगों से, पतन के गर्त से बाहर निकाल कर, उन्नति के शिखर पर ले जाने के लिये, क्रांतिकारी और तर्कसंगत सत्संग दे कर, सारे संसार में मानवता का संचार किया। उन्होंने अपनी वाणी के विषय भी आम नागरिकों को बनाया था। इसी लक्ष्य को चरम सीमा पर ले जाने का मार्ग, शव्द-सुरत को ही समझा गया। गुरु रविदास जी ने शव्द और सुरत का वर्णन अत्यंत तर्क पूर्ण ढंग से, अपनी दिव्य वाणी में किया हुआ है:----
सुरत शव्द जउ इक सम होई, तउ पाइहिं परमानन्द।
रविदास अंतर दीपक जरई, घट घट उपजई ब्रह्मानन्द।।
गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि,जब सुरती और शव्द मिलकर एक हो जाते हैं, तब मन मस्तिष्क में परमानंद पैदा होता है। गुरु जी फरमाते हैं कि, शरीर में ज्ञान का दीपक जल रहा है,इसी से परम् ज्योति के दर्शनों का आनंद मिलता है।
             ।।चोपाई।।
शव्द शव्द का सगल पसारा।
धरन गगन चन्द सूरत खलारा।।
अनहद नाद की धुंन जग बनिआ।
स्थावर जंगम ताना जो तनिआ।।
वरनक शव्द बोल बिच आई।
धुंन आतमक शव्द बोले बिन बुलाई।।
रविदास जा गुर ढिग शव्द को पाईऐ।
शव्द शव्द शव्द करि मोखश पाईऐ।।
रविदास शव्दहिं सह जबहिं इकमिक होइ।
अनुभूति सतनाम स्वयं देतहिं लोई।।
                       ।।दोहा।।
ओंकार को ध्यान माहिं, जौं लौं सुरति ना होय।
तौ लौं सांचे ब्रह्म कूँ, रविदास ना बूझई कोय।।
रविदास दिया जगमग जरई, बिन बाती बिन तेल।।
सुरत साधी करि हिय माहिं, देख पिया के खेल।।
                   ।।शव्द केदारा।।
सतगुर को मिलना सुरति सगले ख़ौफ़ गबावो जी।
देवी संपदा के गुन पहिरो असुरी संपदा उठावो जी।
गिआन खड़ग का लेकर टेंगा, तरवर मिरगां बचाबो जी।
नाम अंगूरी का वोह पैहरू, गुर का वचन रखावो जी।
पंच पच्ची छिन दूर भागै सुरत शव्द मलाबो जी।
घोर अंधेर दूर जावत गिआन मशाल जगावो जी।
दीन मजहब के बंधन टूट्स रग रग शव्द वसावो जी।
लाज काज का लांछन जावै तिल प्राग में नहावो जी।
अपार धाम का ताला खुहले, कूंजी शव्द की लावो जी।
रविदास सतिगुर हथ कूंजी, सतिगुर के ढिग जावो जी।
                  ।।दोहा।।
रविदास सुरत कूँ साधी करि, मोहन सों करि प्यार।
भौ जल कर संकट कटंहिं, छूटंहिं बिघन विकार।।
हरि सो हीरा छाँड़ि करहि, करै आन की आस।।
ते नर दोजक जाहिंगे, सति भाखै रविदास।।
         ।।शव्द बिहागड़ा मीराबाई।।
आह लै कूंजी शव्द दी मीरां, खोल बजर कबाड़े नूँ।
उलटी गंगा चलादे नाभों चढ़ादे दसवें दवारे नूँ।
शव्द सुरत इक जुज करके, अगाड़ी मूरत गुर की धरके।
तूँ तां बेख लै घट मध बड़ के, सरब जोत नजारे नूँ।।
इड़ा पिंगला सुखमना नाड़ी, तोड़ सन्ध तिन्हां दी भारी।
नाल शव्द दे लाके यारी, लटाके छडदे सारे नूँ।।
मुसलसी आलम हुतल छोड़,सुनं महांसुनं सुरत को जोड़।
आलम हुतल वल चल दौड़, सच खण्ड कर लै दीदारे नूँ।।
आगे धुंन बांसुरी दी आईं, तिस धुंन में तूँ सुरत लगाई।
अलख अगम अनामी जाई, पा लै मरतबे भारे नूँ।।
रविदास सुरत चढ़ावे, जैहरों मीरां अमरत मीरां अघावे।
जीवत मरन अलोप हो जावे, झूठे छड संसारे नूँ।
गुरु रविदास और स्वामी ईशरदास जी महाराज ने उपरोक्त वाणी में शव्द और सुरत का आदर्श मणिकांचन योग बताकर, हमें आदर्श जीवन व्यतीत करने का रास्ता दर्शाया हुआ है, वे शव्द और सुरत की एकाग्रता से संसार की नश्वरता से भी निजात पाने की प्रक्रिया समझाते हैं। सभी सुखों का मूलमंत्र अच्छी शिक्षा ही है, जिस से सभी प्रकार की मुक्तियों के दरवाजे खुलते हैं, जिन्हें आज तक सवर्ण तिलकधारी ब्राह्मणों ने, मूलनिवासियों लिये बन्द कर रखे थे।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदिधर्म मंडल।
अक्टूबर 06, 2020।

Comments

Popular posts from this blog

गुरु रविदास जी की क्रांतिकारी वाणी दोधारी है।

क्रांतिकारी शूरवीर गुरु रविदास जी महाराज।।

उत्तर प्रदेश में चल रहा बुलडोजर।