गुरु रविदास और विश्व सदभावना।।

    ।।गुरु रविदास और विश्व सदभावना।।
गुरु रविदास जी महाराज, के समय तक, विश्व में पूर्ण रूप से अराजकता, अत्याचार, अन्याय लूट पाट, अनाचार व्याप्त था। भारत के शासकों ने आपसी विद्वेष, फूट, और अहंकार के कारण विदेशी हमलाबरों को भारत में घुसने का सरल और पूर्ण अवसर प्रदान किया हुआ था। ईस्वी पूर्व,187 तक मौर्य शासकों का अंत हो गया था, जिस के बाद, भारत में वैचारिक भिन्नताएं जन्मी और विदेशी धर्मों का आगमन शुरू हुआ, भारत में सामाजिक तनाव बढ़ने लगा, भारत खण्ड खण्ड होने लगा, धर्म, जाति के नाम पर फूट डालना शुरू हो गया। ईसा से पूर्व ही ग्रीक आक्रांता वैक्टीरिया ने यवन शासक के रूप में, भारत में पैर पसारने शुरू कर दिए। शक्तिशाली सिकन्दर जिसे अलक्षेन्द्र भी कहा जाता है, ने 356 ईसा पूर्व भारत में घुसपैठ की। ईस्वी पूर्व 160-120, पूर्व मिनेडर उर्फ मिलिंद विदेशी शासक आया। उसके बाद वृहद्रथ राजा का अंत किया गया, जिसके बाद भारत में शक शासन रहा। कुषाणों ने ईस्वी सन 60-240 तक राज किया। कनिष्क प्रथम 127 से 150 तक शासक रहा और 151 ईस्वी में  कनिष्क मर गया था, उसके बाद खानाबदोश बर्बर हूँण जाति शासक बनी, जो ईस्वी सन 528 तक सत्तासीन रही थी, अरब और ईरानी शासक 638 से 715 तक रहे जिनके नौ खूंखार खलीफाओं ने भारत में राज किया। उनके बाद ईसवी सन 711 मुहम्मद बिन कासिम ने सत्ता छीनी। ईस्वी सन 977 से लेकर गजनवी तुर्क शासन शुरू हुआ। मुहम्मद गौरी ने सन 1175 ईस्वी में मुल्तान पर कब्जा किया,1206 से 1290 तक गुलाम वंश ने भी सत्ता  संभाली। 1290 से 1320 तक खिलजी वंश ने राज किया 1321 से 1412 तक तुगलक वंश और 1414 से 1451 तक खिज्र खां का राज रहा। 1451 से 1526 तक लोधी वंश ने सत्ता छीन कर भारतवर्ष में शासन किया।1526 ईस्वी में बाबर ने, इब्राहीम लोधी को पानीपत में हरा कर सत्ता छीनी।
इतने लंबे समय तक, विदेशी लूटेरों ने, ब्राह्मणों की वर्ण व्यवस्था का लाभ उठा कर, भारत में शासन किया, जिसमें भारत के शासकों में से कुछ को छोड़कर लूटेरों की गुलामी स्वीकार करके जीवन जी लिया, भारत को लुटने दिया, मगर मनुवादी शासकों ने इन आक्रांताओं को भारत से भगाने के लिए हिम्मत की, क्योंकि, पाँच प्रतिशत राजपूत इन लुटेरों का मुकाबला नहीं कर सके और ब्राह्मणवादी वर्ण व्यवस्था के शिकार हो कर, पिटते और मरते रहे। पन्द्रवीं शताब्दी में, ईश्वरीय शक्ति ने चँवर वंश परिवार में अवतार के रूप में, गुरु रविदास जी महाराज को आना पड़ा, जिन्होंने देशी विदेशी लुटेरों से भारत की जनता की रक्षा के लिये, क्रांतिकारी संघर्ष शुरू करके, वर्ण व्यवस्था पर कड़े से कड़े प्रहार किए जिससे संपूर्ण ब्राह्मणवाद हिल गया। तीनों वर्णों, क्षत्रियों, वाणियों और शूद्रों को ब्राह्मणों की गुलामी से अगर मुक्त कराया तो केवल, गुरु रविदास जी ने ही अपनी प्रखर वाणी रूपी ढाल और तलबार बचाया था। तीनों वर्णों को एक मंच पर ला कर, आपस में समरसता पैदा कर के, भाईचारा स्थापित किया। समाज में आपस में जातीयता के भेदभाव को मिटाने के लिए गुरु जी ने बड़ी शालीनता से कहा:----
जातपात के फेर में,उरझि रहि सब लोग।।
मनुषता कूं खात है,रविदास जात कु रोग।।
गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि, जातिपाँति के चक्कर में भारत के लोग उलझे हुए हैं, यही जाति पाति की बीमारी, मनुष्य को खाती जा रही है।
जन्म जात कछु मत पूछिए, का जात अरु पात।
रविदास पूत सब प्रभु के, कोउ नाहिं जात कुजात।
गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि, किसी की जन्म जात मत पूछो, सभी ईश्वर की संतानें हैं, कोई भी जात कुजात नहीं है।
रविदास इक ही नूर ते, जिमि उपजयो, संसार।
ऊँच नीच किह विध भये, ब्राहमण अरु चमार।।
गुरु रविदास जी महाराज जातिपाति को मानव द्वारा बनाई गई हैं बताते हैं, जिनसे आपसी मैत्री, प्यार, सौहार्द, स्नेह, सदभावना समाप्त हो चुकी है, इसीलिए वे समझाते हैं कि, जब सभी एक ही ज्योति से पैदा हुए हैं तो फिर, चमार और ब्राह्मण किस प्रकार बन गए।
रविदास जन्म के कारने, होत ना कोउ  नीच।
नर कूं नीच करि डारि हैं,ओछे कर्म की कीच।।
गुरु जी फरमाते हैं कि, कोई भी जन्म से ऊँच नीच नहीं होता है, आदमी को उसके निम्न स्तर के कर्म का कीचड़ ही सबको नीच बनाता हैं।
रविदास जात मत पूछिए, का जात अरु पात।
ब्राहमण, क्षत्री, बैस, सूद सभन की एक जात।।
गुरु जी कहते हैं कि, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वाणियां, शूद सभी की एक ही जाति है, "आदमी" क्योंकि जातियां तो जानबरों, पक्षियों, कीड़ों मकोड़ों की ही होतीं है, जिनके शारीरिक अंगों की बनाबट अलग अलग होती है, मगर मानव जाति के तो सभी अंग प्रत्यंग एक समान हैं, भले ही स्थान, वायु, वातावरण के कारण ही उनके रंग रूप में भेद हो, इसीलिए आदमी को किसी की जाति नहीं पूछनी चाहिए। हिन्दू, मुस्लिम, और ईसाई को ही नहीं अपितु संपूर्ण मानव जाति को मिल कर, आपसी सदभावना के लिये गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि, हिंदुओं और मुसलमानों को आपस मे मित्रता और प्रेम करना चाहिए और प्रेम से ही रहना चाहिए, क्योंकि सभी उसी प्रभु के प्रकाश की किरणें हैं, सभी एक दूसरे के मित्र हैं।
मुसलमान सियों दोसती, हिंदुअन सियों करि प्रीत।
रविदास जोति सब प्रभु की,सभ हैं अपने मीत।।
मन्दिर मस्जिद चर्च की भी एकता के लिए गुरु रविदास जी कहते हैं:----
मन्दिर मस्जिद दोउ एक हैं, इन माहिं अंतर कोउ नाहीं।
रविदास राम रहीम रहमान का, झगड़ा कोउ नाहिं।।
हिन्दू और मुसलमान मन्दिर, मस्जिद के नाम पर अलग अलग रहते हैं, गुरु जी फरमाते हैं कि, इन दोनों में कोई अंतर नहीं है और ना ही राम रहीम की कोई लड़ाई है। प्रसिद्ध साहित्यकार डाक्टर यश गुलाटी ने "युग प्रवर्तक संत गुरु रविदास, पृष्ठ-161" पर लिखते हैं, सतगुरु रविदास जी महाराज ने सांप्रदायिकता की प्रवृत्ति का विरोध करते हुए, हिन्दू-मुस्लिम एकता पर बल दिया है।उनकी दृष्टि में मन्दिर-मस्जिद एक ही हैं। राम रहीम भिन्न नहीं हैं। काबा काशी में कोई अंतर नहीं है। वे ना मस्जिद से घृणा करते हैं, ना ही मन्दिर से प्यार, क्योंकि उन्हें ना तो मंदिर में राम दिखाई पड़ता है और ना ही मस्जिद में अल्लाह। उनको यह सोचकर आश्चर्य होता है, कि हिंदू मुसलमान दोनों के हाथ, पांव, नाक और कान एक जैसे हैं, फिर मानव को भिन्न कैसे समझा जा सकता है। वास्तव में हिंदुओं औऱ मुसलमानों का संबंध तो कनक-कंगन जैसा है:----
रविदास जीव कूं मारि करि, कैसे मिलिहिं खुदाय।
पीर पैग़ंबर औलिया, कोउ ना कहि समझाय।।
गुरु रविदास जी जीव हत्या को पाप मान कर फरमाते हैं, कि जीवों को मार कर भगवान किस प्रकार मिल सकते हैं, क्या कोई मां वाप अपने बच्चों के हत्यारों, कातिलों से प्यार करेगा? भले ही वह हत्यारे को बददुआ ना दे मगर फिर भी उस हत्यारे की ओर मेहरभरी दृष्टि नहीं डालेगा, जिससे उसका कभी कल्याण नही हो सकता है।इस रहस्य को कोई भी पीर पैग़ंबर और औलिया समझा नहीं पाया है।
रविदास जीव मत मारहिं,इक साहिब सब माहिं।
सब माहिं एकउ आतमा, दूसरहि कोउ नाहिँ।।
गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि किसी भी प्राणी को मत मारो, सभी में उसी परम पिता परमेश्वर का अंश है, सदा उसी की शरीर में पवित्र आत्मा निवास करती है, जिसके अतिरिक्त दूसरी शक्ति कोई नहीं है।
गुरु रविदास जी विश्व में एक फरिश्ता बन कर आए थे, जिन्होंने बिना तोप तीर, तलबार और सैन्य शक्ति के ही, बड़े बड़े बेदर्द खूनी, कातिल खूंखार,अत्याचारी, निर्दयी, अनाचारी और बलात्कारी बादशाहों को अपने चरणों में झुकने के लिए विवश कर दिया था, फिर उन्होंने गुरु रविदास महाराज के ही आशीर्वाद से ही शासन चलाया था, उनकी हजूरी में ही बाकी बचा हुआ जीवन व्यतीत किया था। गुरु रविदास जी ने सभी धर्मों और पन्थों संप्रदायों, फिरकों को भी आपस में सदभाव बनाकर जीना सिखाया था।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदिधर्म मंडल।
अक्तूबर 05, 2020।







Comments

Popular posts from this blog

गुरु रविदास जी की क्रांतिकारी वाणी दोधारी है।

क्रांतिकारी शूरवीर गुरु रविदास जी महाराज।।

उत्तर प्रदेश में चल रहा बुलडोजर।