गुरु रविदास जी और बेगमपुरा
।।गुरु रविदास जी और बेगमपुरा।।
गुरु रविदास जी की सबसे बड़ी संकल्पना थी, आदर्श वैश्विक बेगमपुरा की स्थापना करना। गुरु जी ने विश्व विजेता बनने वाले ईसाइयों, हिंदुओं, मुसलमानों की विस्तारवादी और कामुकता की थोथी, मिथ्या और अमानवीय तृष्णा को बड़ी बारीकी से समझा था और उनका मनोविश्लेषण भी किया था। शासकों की मृगतृष्णाओं ने, विश्व की जनता का जीना दूभर किया हुआ था और आज भी जारी है, इन्हीं पागल तानाशाहों की तानाशाही से लाखों नारियों के सुहाग उजड़ते हुए, गुरु रविदास जी ने देखे, सुने थे, जिनके कारण वे असिहष्णुता महसूस किया करते थे। वे संतप्त थे कि, कोई सुखी है, तो कोई उन्हीं सुखी लोगों की शोषण की वृत्ति से, गुलामों की जिंदगी नरक बनी हुई है, कुछ लोग नमकहरामी बनकर, कमजोर लोगों से बेगार लेकर, खुद ऐश्वर्यशाली जीवन बसर करते हैं, गुलामों को दिनरात सूली पर चढ़ाए रखते हैं। एक नारी भिखारी और एक नारी घुड़सवारी करते हुई सुखी जीवन जी रही है, जिसके कारण उन्होंने राजनैतिक अमूल चूल परिवर्तन के लिए राजनैतिक महाक्रांति की आवश्यकता समझी। जिसके लिए गुरु जी ने बेगमपुरा की कल्पना की थी और उस कल्पना को पूर्ण करने के लिए प्रयास शुरू कर दिए थे। गुरु रविदास जी महाराज ने अपना अभियान भी विषमयकारी ढंग से शुरू किया था। जब उन्होंने ब्राह्मण भेष बना कर और अद्वितीय आवाज में दहिना शंख बजाया था, जिससे ब्राह्मणों और राजाओं के दिलों में कसक के जहरीले तीर धँस गए, जिसकी दर्द राजा तो सहन भी कर रहे थे, मगर शतप्रतिशत मंदिरों में आरक्षण पाने वाले निठठले बैठकर, खाने वालों के कलेजों पर साँप लेटने लगे। तिलकधारी, पण्डे लगे, गुरु रविदास महाराज की शिकायतें राजाओँ के पास करने, मगर राजे, महाराजे भी गुरु जी की आध्यात्मिक शक्ति के सामने हथियार डाल चुके थे, ब्राह्मण जब बुरी तरह हार गए और समझ भी गए, कि अब राजाओं के वश का काम नहीं है, कि वे गुरु रविदास जी को उनके रास्ते से हटा सकें, तब उन्होंने दिल्ली तख्त के खूंखार, खूनी बादशाह सिकन्दर लोधी को, गुरु रविदास जी महाराज के खिलाफ, उकसाय और भड़काया। जब बादशाह सिकन्दर लोधी भी गुरु जी से बुरी तरह पराजित हो कर, हाथ खड़े करके, गुरु जी का मुरीद बन गया और गुरु जी के पास सरेंडर कर के, हाय तोबा करके गुरु जी के आदेश से शासन करने के तरीके पूछने लगता है, तब गुरु रविदास जी महाराज ने कहा बादशाह :------
"ऐसा चाहूँ राज मैं, जहां मिले सभन को अन्न।
छोट बड़ सभ सम वसै, तां रविदास रहै प्रसन्न।।
हे बादशाह ! हम ऐसा आदर्श राज चाहते हैं, जिस मे सभी को भरपेट खाने के लिए अनाज मिले, छोटा बड़ा कोई ना हो, कोई अमीर गरीब भी ना रहे, सभी बराबर हों, हम तभी खुश रह सकते। सिकन्दर लोधी ने तत्काल, अपने बजीरों को हुक्म देकर गरीबों के टेक्स माफ करवा दिए, और गरीबों के लिए मुफ्त लंगर लगवा दिए, चोर बाजारी, हत्या, अत्याचार, अनाचार, व्याभिचार, बलात्कार बन्द करके, अपराध करने वाले दुष्ट अपराधियों को कड़ी से कड़ी सजाएं घोषित कर दीं। कोई अमीर, गरीब नहीं रहेगा। जितने समय तक बादशाह सिकन्दर लोधी ने भारत में शासन किया ठीक, इसी नियम और गुरु रविदास जी के निर्देशानुसार किया था। गुरु रविदास जी ने प्रजा को भी बेगमपुरा की पहचान बताते हुए कहा:--
रविदास जोउ है बेगमपुरा, ओह पूर्ण सुख धाँम।।
दुख अन्दोहु अरु द्वेष भाव, नाहीं बसहिं तिहि ठाँव।।
गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि, बेगमपुरा शहर ऐसा शहर होता है जहाँ किसी को भी दुख नहीं होता है, वहाँ सभी एक समान, पूर्णरूपेण सुखी रहते हैं।
रविदास मनुष करि बसन कू, सुख करहि हैं दुई ठाँव।।
इक सुख है स्वराज माहिं, दूसर है मरघट गाँव।
गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि, पहले तो अपने स्वतन्त्र राज में ही सुख होता है, दूसरी जगह श्मशानघाट ही है जहाँ सभी नागरिक निर्जीव होकर, सुख से रहते हैं। गुरु रविदास महाराज बेगमपुरा के बारे में विस्तार से बताते हैं:---
।।शव्द।।
बेगमपुरा सहर कोउ नाऊँ।
दुखु अन्दोहु नहिँ तिह ठाँऊं।।
नाँ तसबीस खिराजु ना मालु।
खउफ़ ना ख़ता ना तरसु जबालु।।
अब मोहिं खूब वतन गह पाई।
ऊहां ख़ैरि सदा मेरे भाई।।रहाउ।।
क़ाइम दाईमु सदा पातिशाही।
दोम ना सेम इक सो आही।।
आबादानु सदा मसहूर।
ऊहां गनी बसहिं मामूर।।
तिउ तिउ सैल करहि जिउ भावै।
महरम महल ना कोउ अटकावै।।
कहि रविदास खलास चमारा।
जोउ हम सहरी सू मीतू हमारा।।
गुरु रविदास जी महाराज ने, विश्व को ही बेगम शहर बनाने का प्रारूप तैयार किया था, जिसके लिये उन्होंने वैश्विक सरकार की कल्पना की थी, सारे विश्व के बोटर बोटिंग करके एक ही शासक चुने, बाकी विश्व के सभी देशों के राष्ट्राध्यक्ष उस के नियंत्रण में कार्य करें और वे बहुमत से निर्णय लेकर प्रजा को सुखी रखने की योजनाएं, इस कार्यनीति से किसी को भी सुरक्षा हेतु, असँख्य सेना रखने की आवश्यकता नहीं होगी, कोई भी तानाशाह ना तो बन सकता था और ना ही कोई तानाशाही कर सकता था। धार्मिक एकता के लिए केवल धर्म का भी एक ही वैश्विक धर्मग्रँथ "पोथिसाहिब" को अंतिम रूप दे दिया गया था, जिसमें विश्व के समस्त महापुरुषों की वाणी और विचार शामिल किए गए थे मगर दुर्भाग्य ये हुआ कि, उनके ज्योतिर्लीन हो जाते ही, उनके संपूर्ण दिव्य साहित्य को अग्नि की भेंट चढ़ा दिया गया था मगर पुनः, स्वामी ईशरदास जी महाराज ने सन 1900 में, गाँव सोहलपुर जिला जालन्धर, पंजाब में जन्म लेकर, ऐसा ही गुरु रविदास जी, सहित सात सौ अंर्तराष्ट्रीय सन्तों महापुरुषों की वाणियों को लिखकर "गुरु आदिप्रकाश ग्रँथ" की रचना की हुई है, जिसे वैश्विक ग्रँथ आज नहीं तो भविष्य में अवश्य स्वीकारा जाएगा। स्वामी ईशर दास जी महाराज ने, इसी ग्रँथ में लिखा है जो आज सत्य सिद्ध होता नजर आ रहा है:-----
"आएगा जब बीस सौ बीसा,
ना रहेगा ईसा ना रहेगा मूसा"
स्वामी ईशरदास फरमाते हैं कि, जब बीस सौ बीस आएगा तब ईसा अर्थात ईसाई और मूसा अर्थात मुसलमान नहीं रहेंगे, जो आज सत्य सिद्ध हो रहा है, सभी आपस में लड़ मर रहे हैं। आज वैश्विक सरकार होती तो विश्व युद्ध कभी नहीं होते। तीसरे विश्व युद्ध का आरंभ हो चुका है, आगे देखते जाओ क्या क्या होता है? ऐसा सटीक सत्य आज तक कोई नहीं कह सकता है।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदिधर्म मंडल
अक्टूबर 03, 2020। ।।गुरु रविदास जी और बेगमपुरा।।
गुरु रविदास जी की सबसे बड़ी संकल्पना थी, आदर्श वैश्विक बेगमपुरा की स्थापना करना। गुरु जी ने विश्व विजेता बनने वाले ईसाइयों, हिंदुओं, मुसलमानों की विस्तारवादी और कामुकता की थोथी, मिथ्या और अमानवीय तृष्णा को बड़ी बारीकी से समझा था और उनका मनोविश्लेषण भी किया था। शासकों की मृगतृष्णाओं ने, विश्व की जनता का जीना दूभर किया हुआ था और आज भी जारी है, इन्हीं पागल तानाशाहों की तानाशाही से लाखों नारियों के सुहाग उजड़ते हुए, गुरु रविदास जी ने देखे, सुने थे, जिनके कारण वे असिहष्णुता महसूस किया करते थे। वे संतप्त थे कि, कोई सुखी है, तो कोई उन्हीं सुखी लोगों की शोषण की वृत्ति से, गुलामों की जिंदगी नरक बनी हुई है, कुछ लोग नमकहरामी बनकर, कमजोर लोगों से बेगार लेकर, खुद ऐश्वर्यशाली जीवन बसर करते हैं, गुलामों को दिनरात सूली पर चढ़ाए रखते हैं। एक नारी भिखारी और एक नारी घुड़सवारी करते हुई सुखी जीवन जी रही है, जिसके कारण उन्होंने राजनैतिक अमूल चूल परिवर्तन के लिए राजनैतिक महाक्रांति की आवश्यकता समझी। जिसके लिए गुरु जी ने बेगमपुरा की कल्पना की थी और उस कल्पना को पूर्ण करने के लिए प्रयास शुरू कर दिए थे। गुरु रविदास जी महाराज ने अपना अभियान भी विषमयकारी ढंग से शुरू किया था। जब उन्होंने ब्राह्मण भेष बना कर और अद्वितीय आवाज में दहिना शंख बजाया था, जिससे ब्राह्मणों और राजाओं के दिलों में कसक के जहरीले तीर धँस गए, जिसकी दर्द राजा तो सहन भी कर रहे थे, मगर शतप्रतिशत मंदिरों में आरक्षण पाने वाले निठठले बैठकर, खाने वालों के कलेजों पर साँप लेटने लगे। तिलकधारी, पण्डे लगे, गुरु रविदास महाराज की शिकायतें राजाओँ के पास करने, मगर राजे, महाराजे भी गुरु जी की आध्यात्मिक शक्ति के सामने हथियार डाल चुके थे, ब्राह्मण जब बुरी तरह हार गए और समझ भी गए, कि अब राजाओं के वश का काम नहीं है, कि वे गुरु रविदास जी को उनके रास्ते से हटा सकें, तब उन्होंने दिल्ली तख्त के खूंखार, खूनी बादशाह सिकन्दर लोधी को, गुरु रविदास जी महाराज के खिलाफ, उकसाय और भड़काया। जब बादशाह सिकन्दर लोधी भी गुरु जी से बुरी तरह पराजित हो कर, हाथ खड़े करके, गुरु जी का मुरीद बन गया और गुरु जी के पास सरेंडर कर के, हाय तोबा करके गुरु जी के आदेश से शासन करने के तरीके पूछने लगता है, तब गुरु रविदास जी महाराज ने कहा बादशाह :------
"ऐसा चाहूँ राज मैं, जहां मिले सभन को अन्न।
छोट बड़ सभ सम वसै, तां रविदास रहै प्रसन्न।।
हे बादशाह ! हम ऐसा आदर्श राज चाहते हैं, जिस मे सभी को भरपेट खाने के लिए अनाज मिले, छोटा बड़ा कोई ना हो, कोई अमीर गरीब भी ना रहे, सभी बराबर हों, हम तभी खुश रह सकते। सिकन्दर लोधी ने तत्काल, अपने बजीरों को हुक्म देकर गरीबों के टेक्स माफ करवा दिए, और गरीबों के लिए मुफ्त लंगर लगवा दिए, चोर बाजारी, हत्या, अत्याचार, अनाचार, व्याभिचार, बलात्कार बन्द करके, अपराध करने वाले दुष्ट अपराधियों को कड़ी से कड़ी सजाएं घोषित कर दीं। कोई अमीर, गरीब नहीं रहेगा। जितने समय तक बादशाह सिकन्दर लोधी ने भारत में शासन किया ठीक, इसी नियम और गुरु रविदास जी के निर्देशानुसार किया था। गुरु रविदास जी ने प्रजा को भी बेगमपुरा की पहचान बताते हुए कहा:--
रविदास जोउ है बेगमपुरा, ओह पूर्ण सुख धाँम।।
दुख अन्दोहु अरु द्वेष भाव, नाहीं बसहिं तिहि ठाँव।।
गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि, बेगमपुरा शहर ऐसा शहर होता है जहाँ किसी को भी दुख नहीं होता है, वहाँ सभी एक समान, पूर्णरूपेण सुखी रहते हैं।
रविदास मनुष करि बसन कू, सुख करहि हैं दुई ठाँव।।
इक सुख है स्वराज माहिं, दूसर है मरघट गाँव।
गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि, पहले तो अपने स्वतन्त्र राज में ही सुख होता है, दूसरी जगह श्मशानघाट ही है जहाँ सभी नागरिक निर्जीव होकर, सुख से रहते हैं। गुरु रविदास महाराज बेगमपुरा के बारे में विस्तार से बताते हैं:---
।।शव्द।।
बेगमपुरा सहर कोउ नाऊँ।
दुखु अन्दोहु नहिँ तिह ठाँऊं।।
नाँ तसबीस खिराजु ना मालु।
खउफ़ ना ख़ता ना तरसु जबालु।।
अब मोहिं खूब वतन गह पाई।
ऊहां ख़ैरि सदा मेरे भाई।।रहाउ।।
क़ाइम दाईमु सदा पातिशाही।
दोम ना सेम इक सो आही।।
आबादानु सदा मसहूर।
ऊहां गनी बसहिं मामूर।।
तिउ तिउ सैल करहि जिउ भावै।
महरम महल ना कोउ अटकावै।।
कहि रविदास खलास चमारा।
जोउ हम सहरी सू मीतू हमारा।।
गुरु रविदास जी महाराज ने, विश्व को ही बेगम शहर बनाने का प्रारूप तैयार किया था, जिसके लिये उन्होंने वैश्विक सरकार की कल्पना की थी, सारे विश्व के बोटर बोटिंग करके एक ही शासक चुने, बाकी विश्व के सभी देशों के राष्ट्राध्यक्ष उस के नियंत्रण में कार्य करें और वे बहुमत से निर्णय लेकर प्रजा को सुखी रखने की योजनाएं, इस कार्यनीति से किसी को भी सुरक्षा हेतु, असँख्य सेना रखने की आवश्यकता नहीं होगी, कोई भी तानाशाह ना तो बन सकता था और ना ही कोई तानाशाही कर सकता था। धार्मिक एकता के लिए केवल धर्म का भी एक ही वैश्विक धर्मग्रँथ "पोथिसाहिब" को अंतिम रूप दे दिया गया था, जिसमें विश्व के समस्त महापुरुषों की वाणी और विचार शामिल किए गए थे मगर दुर्भाग्य ये हुआ कि, उनके ज्योतिर्लीन हो जाते ही, उनके संपूर्ण दिव्य साहित्य को अग्नि की भेंट चढ़ा दिया गया था मगर पुनः, स्वामी ईशरदास जी महाराज ने सन 1900 में, गाँव सोहलपुर जिला जालन्धर, पंजाब में जन्म लेकर, ऐसा ही गुरु रविदास जी, सहित सात सौ अंर्तराष्ट्रीय सन्तों महापुरुषों की वाणियों को लिखकर "गुरु आदिप्रकाश ग्रँथ" की रचना की हुई है, जिसे वैश्विक ग्रँथ आज नहीं तो भविष्य में अवश्य स्वीकारा जाएगा। स्वामी ईशर दास जी महाराज ने, इसी ग्रँथ में लिखा है जो आज सत्य सिद्ध होता नजर आ रहा है:-----
"आएगा जब बीस सौ बीसा,
ना रहेगा ईसा ना रहेगा मूसा"
स्वामी ईशरदास फरमाते हैं कि, जब बीस सौ बीस आएगा तब ईसा अर्थात ईसाई और मूसा अर्थात मुसलमान नहीं रहेंगे, जो आज सत्य सिद्ध हो रहा है, सभी आपस में लड़ मर रहे हैं। आज वैश्विक सरकार होती तो विश्व युद्ध कभी नहीं होते। तीसरे विश्व युद्ध का आरंभ हो चुका है, आगे देखते जाओ क्या क्या होता है? ऐसा सटीक सत्य आज तक कोई नहीं कह सकता है।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदिधर्म मंडल
अक्टूबर 03, 2020।
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