गुरु रविदास जी के शब्द गंभीर घाव करते हैं।।

।।गुरु रविदास जी के शब्द गंभीर घाव करते हैं।।
गुरु रविदास जी महाराज ने, कभी भी किसी भी अमीर, सेठ, शेख, महाराजा, बेगम, बादशाहों के ख़ौफ़ की तनिक भी चिंता, भय, क्रोध की चिंता नहीं की। वे हमेशा सत्य की तलबार से ही अटैक करते थे और अपने शिकार को मार गिराते थे, ऐसा घाब करते थे, कि शिकार पानी तक नहीं मांग पाता था और ना ही मरता था, ना ही जिंदा रहंता था। इतने बड़े ज्योतिर्ज्ञानी थे कि, गुरु रविदास जी। सारा ज्योतिर्मंडल उनके मुख के प्रकाश से जगमगा उठा था, मगर ब्राह्मण लेखकों ने सत्य को दरकिनार कर रखा और असत्य की भूरी भूरी प्रशंसा करते आए हैं, अश्लीलता ही परोसने वाले मनुवादी कवि बिहारी के बारे में लिखते हैं," सतसैया के दोहरे ज्यों नाविक के तीर, देखन में छोटे लगे, घाब करें गंभीर। 
मगर गुरु रविदास जी ने, किसी भी प्रकार की गन्दगी परोस कर, समाज को विकृत नहीं किया, ना ही कभी श्रृंगार रस को मुंह लगाया, उनकी वाणी में, कहीं भी हास्य रस को कोई स्थान नहीं दिया गया है, मगर वक्रोक्ति अलंकार और लक्षणा, व्यंजना शब्द शक्ति से, अपनी बात को, ऐसे ढंग से प्रकट किया है कि, हथियाबन्द और खूनी क्रान्ति का आह्वान स्पष्ट नजर आता है। उनके भाव चार चार शब्द, खूनी क्रान्ति ला चुके हैं, रूस आदि साम्यवादी लोग गुरु जी के संविधान की ही बदौलत खूनी क्रांतियों को अंजाम दे चुके हैं।
गुरु रविदास जी महाराज के क्रांतिकारी भाव, जनमानस को बुरी तरह से हिला कर रख दिया करते हैं, भक्ति के मार्ग पर चलते हुए भी, महाक्रांति का शंखनाद करते है, अगर पत्थर दिलों को भी कोमल बनाने का जज्बा कहीं, किसी की रचना में मिलता है तो केवल गुरु रविदास जी की वाणी में ही मिलता है, क्रांतिकारी वीर रस का संचार अगर मिलता है तो केवल गुरु रविदास जी की वाणी में। गुरु जी विचार तो शान्ति का देते मगर उनके भाव महाक्रांति के निकलते हैं:----
बेगमपुरा शहर को नांऊँ।।
गुरु रविदास जी महाराज धरती पर ऐसा शहर बसाने की बात करते है, जहां किसी किस्म का गम ना हो। किसी किस्म का ऊँच-नीच, छुआ-छूत का कलंक ना हो, कोई बड़ा छोटा ना हो, मगर बेगमपुरा बनाने के रास्ते में, अगर कोई रोड़ा बन जाए तो उसे हटाने के लिये खूनी क्रान्ति का भी ऐलान करते हैं, क्योंकि शांति हमेशा क्रान्ति के बाद ही आती है और क्रान्ति खून मांगती है। गुरु जी लिखते हैं कि:----
ऐसी लाल तुझ बिन कौन करै।
इन छः शब्दों की पंक्ति की व्याख्या करते हुए, प्रोफेसर लालसिंह जी, अपने शोध काव्य,"आदिधर्म बनाम विश्व धर्मग्रंथ आदि पोथीसाहिब साहिब दे सिरजक सतिगुरु रविदास जी" के पृष्ठ 137 पर लिखते हैं कि, इन शब्दों में कहीं पर भी वैराग्य की भावना दिखाई नहीं देती है, ऐसी लाल शब्द में तो महाबली शूरवीर, महान गुरु रविदास जी ने, आदिवासी, शूद्रों, अछूत गरीब वर्ग के महाबली शूरवीर सन्तों गुरुओं को संबोधन करते हुए स्पष्ट किया है कि, इन्होंने हिन्दू धर्म के भगवानों के जुल्मों के विरुद्ध निर्भय हो कर क्रान्ति ही मचाई है। अछूतों के हकों की प्राप्ति के लिए ही, गुरु रविदास जी महाराज ने, हथियारबंद फ़ौज की सहायता से युद्ध कर के जीत प्राप्त की है और सिर के ऊपर छत्र झुलाया है। ऐसा सर्वशक्तिमान प्रभु की कृपा से ही संभव हुआ है, क्योंकि वही सब कुछ करने के लिए समर्थ है।
प्रोफेसर लालसिंह जी लिखते हैं कि, मारू राग में दूसरे शब्द में," सुख सागर सुरतरू चिन्तामणि कामधेनु वसि जा कर" लिख कर, हिन्दू धर्म द्वारा लताड़े और सताए गए अछूत लोगों को संबोधित है। इस शब्द में वैराग्य की भावना का अभाव है, इस में तो हिन्दू धर्म की, विचारधारा को बदल कर, इस के स्थान पर एक नए विश्व धर्म की, क्रांतिकारी हथियारबंद और संघर्ष वाली विचारधारा को स्थापित किया गया है, जिस की आदिवासी शूद्र, अछूत वर्ग को अत्यंत जरूरत थी। ये खूनी क्रांतिकारी विचारधारा हिन्दू धर्म के लताड़े और सताए हुए मूलनिवासी अछूतों, शूद्रों और गरीबों को अणखीले (स्वाभिमानी) बनाती है, कायरता को नष्ट कर के जुरूअत पैदा करती है, निर्भय बनाती है। स्पष्ट रूप में, बिना किसी संकोच से गुरु रविदास जी की यह क्रांतिकारी विचारधारा सत्य पर चलते हुए हर क्षेत्र में, केवल क्रान्ति ही मचाने के लिए क्रांतिकारी सिर लेख शूरमे पैदा करती है। दरअसल ऐसे ही महान बली सिर लेख शूरमे ही बेगमपुरा विश्व वर्ण का सृजन  करने के लिए अत्यंत जरूरी हैं।
प्रोफेसर लालसिंह जी ने सिद्ध किया है कि, गुरु रविदास जी की वाणी में निहित विचारधारा क्रांतिकारी वीरों को जन्म देती है, गुरु रविदास जी क़ा लक्ष्य भी यही था कि, जिनके मन में पाँच हजार सालों से भय और मनुवादी आतंक जमा हो चुका है, उसे मानसिक बंकरों में से निकाला जाए, जिस के लिए मारू राग में ही, दबे कुचले वर्ग को क्रान्ति वीर बनाया जा सकता है। अछूतों की मरी हुई आत्मा को जिंदा करने के लिए, कठोर कदम उठाते हुए, ब्राह्मण विद्वानों को, बड़ी बुरी तरह पराजित करके, अपना नहीं, अपितु गिराए गए शूद्र वर्ग का मोराल ऊंचा किया, और सिद्ध किया है कि कोई जन्म के कारण छोटा बड़ा नहीं होता है, छोटा बड़ा केवल कर्म के कारण होता है जिस के लिए, संघर्ष जरूरी है, मरने मारने के लिए ततपर रहना जरूरी है, फिर सिर पर छत्र झुलाने वालों की कोई कमी नहीं रहती है। गुरु रविदास के दो चार शब्द ही, अत्याचारियों, जालिमों, शोषकों की जान ले लेते हैं, ऐसे गहरे, गंभीर घाब करते हैं कि, चलाक के चित्त होने का पता तक भी नहीं चलता, बादशाह सिकन्दर लोदी और बादशाह बाबर जैसे खूंखार लोग भी, गुरु रविदास जी के समक्ष निष्प्राण हो कर, असहाय अवस्था में मूर्छित हो कर, उनके चरण कमलों पर गिर पड़े थे, फिर ब्राह्मणों की औकात तो है क्या? अब तो वे कल्कि का रूप भी धारण करके ब्राह्मणवाद को समूल नष्ट करने आ रहे हैं, जिस का चित्रण स्वामी ईशरदास जी महाराज, अपने गुरु आदिप्रकाश ग्रँथ में कर गए हैं, इसीलिए मैं कहता हूँ कि;----
गुरु रविदास जी के चौपाए छपाए तीर।
देखन में छोटे लगें, घाब करें अति गंभीर।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदिधर्म मंडल।
सितंबर 06, 2020।


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