गुरु रविदास के अनुयायी स्वाभिमान से जियें।।

।।गुरु रविदास के अनुयायी स्वाभिमान से जियें।।
गुरु रविदास जी महाराज, स्वाभिमान का नाम है। जिस शूद्र वर्ण में गुरु महाराज जी ने अवतार लिया था, वह तो अति दबाया, गया था, अति कुचला हुआ वर्ण था जिस की नियति थी, केवल पशु बन कर तीनो वर्णों की सेवा करना, बेगार और गुलामी करना, जिस के अतिरिक्त इस वर्ण को, सुख से जीने का कोई अधिकार नहीं था। केवल नङ्गे भूखे पेट काम करके दासों की जिंदगी जीना ही इन के भाग्य में था।ऐसा नहीं कि, इस वर्ण में, कोई कम बुद्धि के  व्यक्ति हुए हैं, मगर मनुस्मृतियों के काले और दासता की बेड़ियों से जकड़ने वाले कानून ही, भारत के मूलनिवासियों के लिए राक्षस बन कर, उन का खून पीते आए थे, जिनके कारण आदिपुरुष का सिंहासन हिला और विश्व ज्योति, गुरु रविदास जी, बिकर्मी सम्मत 1433 को कांशी में प्रकट हुई, जिसने विश्व में चल रही दासता की बेड़ियों के बन्धनों को रोका, टोका, काटा और समाजवाद का नारा दिया कि:-----
ऐसा चाहूँ राज मैं जहां मिले सभन को अन्न।
छोट बड़ सभ सम बसै, तां रविदास रहै प्रसन्न।
जिन लोगों ने इन पंक्तियों के भावार्थ को समझा, मनन किया, चिंतन किया, अमल किया वे खुद तो इतिहास पुरुष बने, साथ ही उन्होंने जनता की दासता की बेड़ियों को भी तोड़ा, काटा और साथ ही, बेड़ियों को बनाने वालों को काटा मारा और उनको नेशतनाबूद भी किया। ये इतिहास पुरुष भी, मरे हुए पशुओं को घसीट घसीट कर, चमड़ा उतारने वाले, चमड़े का काम करने वाले ही अब्राहीम लिंकन हुए जिस लोह पुरुष ने अमेरिका की दास प्रथा को समूल खत्म किया, साथ ही शोषकों को भी खत्म किया, इसी तरह रूस में भी अमीरों ने गरीबों का खून चूस चूस कर, गरीबों को कमजोर कर रखा था, जिन्हें उवारने के लिए, लेनिन ने उन्हें साफ किया और रूस को संसार की दूसरी बड़ी शक्ति भी बनाया, इटली के भी लोह पुरुष वीर सपूत हिटलर ने भी, अत्याचारियों का ही सर्वनाश किया और इतिहास पुरुष बन गए, जिनके नाम से आज भी विश्व थरथर कांपता है।भारत में जन्मे गुरु रविदास जी के क्रांतिकारी विचारों ने विश्व को जो टर्न दिए हैं,उनसे अमीरों और गरीबों के बीच की खाई को समाप्त कर दिया था मगर भारतवर्ष के ब्राह्मणों ने विदेशी शासकों से कुछ भी नहीं सीखा और शोषण की नीति पर ही चलते आ रहे हैं।
भारत के मूलनिवासी साहिबे कलाम मंगू राम जी मुगोबाल, कानपुर के अच्छूतानंद जी महाराज ने लार्ड साईमन और लार्ड लोथियन को ज्ञापन देकर मनुवादियों की अमानवीय नीतियों को बताया था, जिससे अंग्रेजों ने भारत में स्थापित मनुस्मृतियों के सभी काले कानूनों को 1947 तक निरस्त करके, प्रकृति के नियमानुसार शासन शुरू कर दिया था, अंग्रेजों के इतने उपकारों के बाबजूद, भारत के मूलनिवासी अंग्रेजों को बाहर निकालने के लिए, अपने खून की होली खेल रहे थे, उदेया वाल्मीकि, बिरसा मुंडा ने अंग्रेजों को मौत के घाट उतार कर, मध्यप्रदेश जे आगे जाने नहीं दिया था। उस ने ही, अछूतों को शहीद होंना सिखाया था, भगतसिंह, उधम सिंह, जैसे वीर सपूतों ने, आजादी की लड़ाई में खून की होली खेली। इधर भारत के मूलनिवासी खून की होली खेल रहे थे, उधर छली ब्राह्मण, अकेले ही आजादी को छीनने की तैयारी में जुटे हुए थे। मूलनिवासी और मुस्लिम लड़ रहे थे, ये ब्राह्मण लोग केवल यही चिंतन कर रहे थे कि, किस प्रकार आजादी मिलते ही, इसे मूलनिवासियों से चुराया जाए, किस प्रकार धोखे से सत्ता खाली होते ही, भारत की सत्ता पर कब्जा किया जाए। मोहनदास करमचंद गांधी, जवाहरलाल नेहरु, रवींद्र नाथ टैगोर, तीनों की त्रिमूर्ति, यही चितन कर रही थी, कि किस तरह गुलामी खत्म होते ही, सत्ता को हथिया लिया जाए मगर हुआ भी ऐसा ही, आजादी से पूर्व संध्या पर, आजादी के परवाने सुभाषचंद्र बोस को मौत के घाट उतार दिया गया, डाक्टर भीमराव आंबेडकर को, संविधान सभा में पहुँचने से पहले ही हरा दिया गया, रह गए केवल थर्ड क्लास में पास होने वाले लोग, जिन्होंने छलकपट से सत्ता पर कब्जा कर लिया और पुनः आदिवासियों को गुलाम बना लिया, जो अंग्रेजों के गुलाम थे, वे तो आजाफ़ हो गए मगर जिन्होंने आजादी के लिए खून वहाया वे फिर मनुवाद के गुलाम हो गए।
फिर जन्मा अब्राहीम लिंकन, व्लादिमीर लेनिन और हिटलर जिन्होंने गरीबों का खून चूसने वालों का सफाया किया था। इतिहास फिर दोहराया गया कि, इन्हीं के व्यवसाय करने वाले, वीर वंश में साहिब कांशीराम का अभ्युत्थान हुआ और वह भी चल पड़े थे, गुरुओं के गुरु रविदास जी के क्रान्ति पथ पर और खत्म कर दी सौ साल पुरानी कांग्रेस। जीत लिया सबसे बड़ा उतर प्रदेश का किला। दूसरे राज्यों में भी उन्होंने टेन्ट लगा लिये थे, मगर जब तक वे दिल्ली फतेह करते तब तक, फिर चला छल प्रपंच वे फिर हो गए ब्राह्मणों के जाल के शिकार, उनके बाद पुनः गुरु रविदास जी का सपूत मान्यवर वामन मेश्राम जी, साहिब कांशी राम जी के अग्निपथ पर चल कर, ब्राह्मणों के किले को ध्वस्त करने के लिए, अपना सारा सफर तय कर चुके हैं, अब जरूरत है केवल गद्दार मूलनिवासियों को समझाने की, कि वे अब छली ब्राह्मण समाज की राजनीतिक पार्टियों को त्याग कर वहुजन फ्रंट में, तत्काल शामिल हो जाएं अन्यथा गुरु रविदास जी का डंडा चढ़ेगा और जो मार पड़ेगी उस से आहत हो कर, ना जी सकेंगे, ना मर सकेंगे।
जिस स्वाभिमान को पाने के लिए, शूद्रों के पैरों की बेड़ियों को काटने के लिए, हाथों की जंजीरों को तोड़ने के लिए,गुरु रविदास जी ने आजीवन संघर्ष किया था, राक्षसों से मुकाबला किया, शूद्रों को मनुस्मृतियों के अमानवीय काले कानूनों से मुक्ति दिलाई, उस स्वाभिमान को, पुनः हथियाने के लिए, वहुजन राज की स्थापना जरूरी है, जब वहुजन राज होगा, तभी भारत में बेगमपुरा वसेगा और जनमानस सुखी रहेगा, अन्यथा मूलनिवासी दासता की चक्की तले पिसता ही रहेगा।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदिधर्म मंडल।
सितंबर 04,2020।

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