गुरु रविदास जी के वंशजों (मूलनिवासियों) का भविष्य।।
।।गुरु रविदास जी के वंशजों (मूलनिवासियों)का भविष्य।।
गुरु रविदास जी महाराज ने, ब्राह्मणों के फैलाए ब्राह्मण जाल की डोरों को काटने के लिए जो कैचीं बनाई थी, उस का नाम था वाणी। गुरु जी ने जब अवतार लिया था, तव कोई भी चमत्कारी महात्मा नहीं था, जो मनुस्मृतियों के जंजाल को काटने की सामर्थ्य रखता हो। कोई भी ऐसा योद्धा नहीं था जो ब्राह्मणवाद के छद्म से युद्ध कर रहा था, मनुस्मृतियों के काले कानून, जिंदा मूलनिवासियों को मुर्दा बनाए हुए थे, जिन का कोई भी सन्त महापुरुष, प्रतिरोध नहीं कर पा रहा था। भारत के सारे मूलनिवासी घुट घुट कर जिंदगी जी रहे थे, जिन्हें मनुस्मृतियों के अत्याचारों से, किसी ने उबारने के लिए, प्रयास किया था, तो वह केवल गुरु रविदास जी ने।
गुरु रविदास जी ने सरवत दा भला,सिद्धांत भारतीयों को दिया,जिसे उनके समकालीन सन्त समाज ने समझा था और उनके पीछे चल पड़े थे, चाहे उन्हें मनुवादी आतंक का ही सामना क्यों नही करना पड़ा था। सभी सन्तों के साथ, अमानवीय व्यवहार किया गया मगर उन्होंने टस से मस नहीं की और गुरु रविदास जी महाराज के सशक्त नेतृत्व में अंधाधुंध अनुगमन करते रहे। गुरु नानक देव जी को पिता की जातीयता की संकीर्ण सोच का शिकार होना पड़ा, सतगुरु कबीर साहिब को भी मौत के कुएं में धकेला गया, सतगुरु नामदेब जी को ब्राह्मणों ने यातनाएँ देकर, उनके ग्रँथ को भी नदी में फैंकवाया।गुरु रविदास जी महाराज, को तो केवल कानूनी लड़ाइयों, ब्राह्मणी परीक्षाओं में ही उलझाए रखा, जिससे उनके समाज सुधार के रास्ते में अनेकों दुश्वारियों को खड़ा किया था। मगर सभी शैतान उनकी वाणी के समक्ष झुके, हारे और टूट कर विखर गए। यही कारण रहा, कि गुरु रविदास जी की वाणी को तवाह कर दिया गया। जो कुछ बची उसे स्कूलों के पाठ्यक्रमों में कभी शामिल ही नहीं किया गया, जिससे भारत को राष्ट्रीय हानि तो हुई ही है मगर विश्व को भी वहुत बड़ा नुकसान हुआ है। अगर गुरु जी की वाणी को विश्वश्विद्यालयों में पढ़ाया जाता, तो आज भारत संसार का सिरमौर होता, विश्व गुरु होता और विश्व पर राज करता मगर, भारत के ब्राह्मणों में कोई भी ज्योतिर्ज्ञानी कभी नहीं जन्मा और ना ही कोई ज्ञानी हुआ हैं, खुद तो ज्ञान प्राप्त नहीं कर सके परंतु, जो किसी के पास था, वह भी नष्ट कर दिया, जो चलन आज भी जारी है, विश्व के देश सारे ज्योतिर्मंडल को छान चुके, मगर भारत के ब्राह्मण आज भी सूर्य, चांद सहित सभी मिट्टी के नवग्रहों के ढेरों की पूजा अर्चना करके, अपने ही पेट भरते जा रहे, जबकि गुरुओं ने कहीं भी इन मिट्टी के ढेरों को अपनी वाणी में, पूजा की सामग्री नहीं बनाया। केवल ब्राह्मणों की ही बात नहीं, सिख जाट भी उनसे पीछे नहीं है, वे भी जातिवाद के शिकार हो कर, मॉनवता को कलंकित करते ही जा रहे हैं। सत्य, तर्क उन्हें भी हजम नहीं होता जब गुरु नानक देव जी और अन्य गुरुओं ने, प्रकृति को ही सर्वस्व माना, प्रकृति को ही स्रष्टा माना, तो फिर ये लोग क्यों वर्णवाद, जातिवाद जैसे अमानवीय कलंक को सिर पर ढोते फिरते हैं? क्यों नहीं अपने गुरुओं के बताए हुए आदर्श रास्तों पर चलते? क्यों गुरुओं की, श्रेष्ठ विचारधारा को काट का जातिवाद का विष वमन करते आए हैं? गुरु रविदास जी ने, बनारस में गुरु नानक देव जी को अपनी पवित्र वाणी भेंट कर के सम्मानित भी किया, गुरु नानकदेव जी के माध्यम से, भटके हुए मनुवादियों को भी कुछ इंसानियत का पाठ पढ़ाने का काम किया गया था, मगर उस सत्य को भी कुछ वर्तमान अंधभक्त, झूठ सिद्ध करते जा रहे हैं, ताकि जातीयता की दीवार को और पक्का किया जाए। कुछ तो ये मान ही नहीं रहे हैं, कि गुरु रविदास जी की वाणी, गुरु नानकदेव जी ने, गुरु रविदास से मांगी थी, कुछ तो कह रहे हैं कि, गुरु अर्जुनदेव जी ने भगतों की वाणी गुरु ग्रँथ साहिब में दर्ज ही नहीं की थी।
प्रोफेसर लालसिंह जी, अपने शोध काव्य "आदि धर्म बनाम विश्व धर्म ग्रंथ आदि पोथीसाहिब दे सिरजक गुरु रविदास जी" के पृष्ठ संख्या 25-26 पर लिखते हैं कि, गुरु रविदास जी ने, गुरु नानकदेव जी को जो वाणी प्रदान की थी, वह पवित्र वाणी गुरु नानक देव जी ने,गुरु रविदास जी की पोथी साहिब से नकल की थी। ये नकल कबीर जी की हाजरी में की गई थी, उस समय उनके सेवक भी साथ थे जिन्होंने भी वाणी की नकल की थी, जिस का अर्थ यह है कि, गुरु रविदास जी का असली पोथी साहिब, उस समय था, जो कि आज गुरु रविदास जी की औलादें उनके पोथीसाहिब की वाणी को पढ़ कर अपना जीवन सफल करना चाहते हैं, फिर किसी को क्या हक है कि गुरु रविदास जी के असली मूलनिवासी उत्तराधिकारियो और आदिवासियों अछूतों, शूद्रों, को उनकी वाणी के अनुसार भगती करने से रोकने के लिए कोई भी धमकियां दें। हिंदुओं ने आदिवासी अछूतों को हिन्दू धर्म ग्रँथों को पढ़ने, सुनने और भगती करने पर, धमकियां देकर रोका है, परन्तु सिखों की ओर से, क्यों अछूत आदिवासियों को गुरु रविदास जी की पोथीसाहिब की वाणी पढ़ने से रोकने के लिए धमकियां दीं जाती हैं, ये साजिश है आदिधर्मियों आदिवासियों की आजादी कत्ल करके पूर्ण गुलाम बनाने की। आदिवासी शूद्र, अछूत अपने महान सतिगुरु, गुरु रविदास, जी की पोथी को ही अपना कर, उसका पूजापाठ करना चाहते हैं। सिख जगत में, सुखमणी साहिब के अलग पाठ होते हैं, वे अपना जीवन सफल करते हैं। सुखमणी साहिब के अलग पूजा पाठ करने पर कोई भी, कभी भी किंतु परंतु नहीं करता, जिसका अर्थ यह है कि, सुखमणी साहिब की वाणी गुरु ग्रँथ साहिब से अलग नहीं है। फिर गुरु रविदास जी की पोथी रूपी वाणी गुरु ग्रँथ साहिब से अलग किस प्रकार हो गई। सिखों के ये दोहरे मापदंड क्यों?
उच्च जातीय सिख विद्वानों की सरगर्मियों की पड़ताल करते हुए, प्रोफेसर लालसिंह जी लिखते हैं, कि अख़ौऊती (तथाकथित) ब्राह्मणवादी सिख विद्वान हरभजन सिंह ने तो, गुरु अर्जुनदेव जी की, ज्योतिर्ज्ञान की सूझबूझ और संपादन की गई, वाणी के ऊपर हमला बोल दिया है और स्पष्ट रूप से कहा है कि, "भगत" (गुरु) रविदास जी की वाणी की पड़ताल होनी चाहिए कि, वह गुरुवाणी की आस मुताबिक सही है। ज्ञानी लालसिंह जी ने यहाँ तक लिख दिया है कि, गुरु अर्जुनदेव साहिब ने गुरु ग्रँथ साहिब के बीच भगतों की वाणी दर्ज ही नहीं की है। वे अपनी पुस्तक "गुरु गिरा कसौटी"/ सार के पृष्ठ नंबर 31-"निरोल वाणी के अंदर महल्लों दी वाणी अंदर", हिन्दू मुसलमान, भगतों, भाटों और डूमो की रचना मिला कर, वाणी बिना और कच्ची वाणी का उल्लंघन करके हमेशा के लिए गुरुवाणी को मिलगोभा वाणी बना दिया गया है'। उपरोक्त दो खतरनाक सबूत तो लिखत रूप में हैं, बाकी सबूत जाने माने विश्व प्रसिद्ध विद्वानों, भगतों की वाणी को, ये लोग कभी प्रचार करके, तुलनात्मक अध्ययन के लिए नहीं प्रयोग करते। ये सत्य अटल सच्चाई 23 नबंबर 2007 को भरपूर रूप में, प्रकट हुई है।
प्रोफेसर लालसिंह जी ने, उन पंजाब में रह रहे, पंजाबी सिखों की पोल खोल कर रख दी है, जिन को हम, अपना साथी हमसफ़र हमदर्द समझते थे, वे तो गुरु रविदास जी की, गुरु अर्जुनदेव जी की भी मॉन्यता को रद्द करने पर चल गए हैं। ये सिख तो 35 प्रतिशत चमार जाति के बीच जन्में मसीहा को ही, अपनी वाणी से निष्कासित करते जा रहे, गुरुओं के किये,कराए को ही मिट्टी में मिला कर रद्द कर बैठे हैं, जो लोग गुरु रविदास जी का विरोध कर रहे हैं, वे सारे सिख समुदाय के प्रतिनिधि माने जा सकते क्योंकि वे भी इन सिखों की बात का खंडन नहीं करते हैं।
अब चिंतन तो हमें करना होगा कि वर्तमान स्थितियाँ में हमें क्या करना होगा? हमारी चमार जाति की आवादी 35 प्रतिशत है, जिसे ब्राह्मण हीनयान बौद्ध, जो हींन निम्न जातियों के लिए है, ईसाइयों, मुस्लिमों, जैनियों, निरंकारियों और राधास्वामियों, रामपाल के कबीरपंथियों, सन्त निरजंन, रविदासियों में विभक्त करता जा रहा है जो चमार जाति के भविष्य के लिए वहुत बड़ा खतरा बनता जा रहा है। चमार समाज सुधारकों राजनेताओं धर्म नेताओं को एक मंच पर आना होगा, एकता के सूत्र में बंध कर एक होकर अपने अस्तित्व को बचाना होगा, अन्यथा ब्राह्मण और जाट दोनों ही मिलकर हमारा भविष्य अंधकारमय बना तो चुके हैं ही मगर भविष्य में भी बनाते रहेंगे, क्योंकि ये लोग अब चमार जाति को विधायक सांसद अफसर बनाने से कतराते है, और इन्हें नोकरियाँ देते समय भयभीत होते हैं।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदिधर्म मंडल।
सितंबर, 02, 2020।
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