गुरु रविदास महाराज सत्पुरुषों को भगवान का दर्जा देते हैं।।
।।गुरु रविदास महाराज सत पुरुषों को भगवान का दर्जा देते हैं।।
गुरु रविदास महाराज ने कभी भी अपने आप को सिद्ध पुरुष के रूप ना तो बताया, और ना ही कभी दिखाया, अपितु उन्होंने हमेशा सन्तों को सर्वोपरि एवं सर्वोच्च मान दे कर ईश्वर तुल्य स्थान देकर, साध सँगत के सेवक बताया है। गुरु जी बड़ी विनम्रता और शालीनता से व्याख्यान करते हुए कहते हैं कि:----
सन्त तुझी तनु संगति प्राण।
सतिगुरु गिआन जानै, सन्त देवादेव।।
गुरु जी फरमाते हैं कि, हे आदिपुरुष! मुझे केवल सत्पुरुषों की सँगत की दात बख्श दे, मेरे लिए केवल श्रेष्ठ, शालीन साधु संत ही सर्वोपरि हैं, उनका संग अर्थात साथ ही मेरे प्राण हैं, वही ज्ञान को जानते हुए देवों के देव हैं अर्थात आपको वही जानते हैं, ऐसे सन्त महापुरुषों के दर्शन से हम धन्य होते हैं, उन के साथ, आप की रस भरी चर्चा सुनने और करने का आनंद आता है, उनसे, आप की स्तुति बारे में सुनकर हम आत्मविभोर हो जाते हैं।
सन्त की संगति सन्त कथा रस।
सन्त प्रेम माझे दीजे, देवा देव।।
गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि, सत्पुरुषों की सँगत ही मेरे लिए प्रभु मिलन है, उन की सँगत में बैठ कर ही मन में आनंद का सागर उमड़ता है, उन के अरविंद मुख से वाणी सुन कर जो रस मिलता है, उससे हम आत्मविभोर हो जाते हैं, हमें ऐसे ही सन्तों के सत्संगों की मधुर वाणी सुनाते रहना। सन्तों की सँगत में ही प्रेम दिखाई देता है, उनके व्याख्यानों और प्रवचनों को सुनते हुए ही देवों के देव अर्थात आप के दर्शन हो जाते हैं। वास्तव में ही, मेरा भी ऐसा ही अनुभव है कि, जब हम सत्पुरुषों के आश्रम में कुछ समय के लिये विश्राम करते हैं, उस समय वहुत मानसिक शांति मिलती है। ऐसा लगता है कि हम आज आध्यात्मिक सागर में पवित्र स्नान कर रहे है, मन हल्का, हल्का और शांत लगता है, जब तक वहां बैठे रहते तब तक हम सारी दुनियां के झमेलों को आत्मविस्मृत कर, उसी सुखमय, अध्यात्म की मौज में खोए रहते हैं। मन चाहता है कि हम यहां से जाएं ही नहीं, मग़र सांसारिक बन्धनों के कारण वह आनंद त्यागना पड़ता है।
गुरु रविदास जी के, सन्त प्रेम से ज्ञात होता है कि, प्रभु भी अपनी रचना और अपने बच्चों को देख देख खुश होते हैं मगर वच्चे भी वच्चे हों आदर्श, अन्यथा कोई उनकी ओर ताकता भी नहीं है। प्रोफेसर लालसिंह जी "" आदिधर्म बनाम विश्व धर्मग्रंथ आदि पोथीसाहिब साहिब दे सिरजक सतिगुरु रविदास जी "" के पृष्ठ संख्या "57" पर बड़ी शूक्ष्मता से चित्रण करते हैं कि:----
"" गुरु रविदास जी संता नूँ केवल प्रभु ही नहीं मनदे, ओह तां "रहाउ" विच सिद्धांतक तौर ते भी दृढ़ करदे हन कि, हे प्रभु! मैनूं सँगता बख्श, तां जो मैं उन्हां दीआं महान गोष्ठियां अते विचार कथा दा आतम आनंद मांण सकां। इस मंतव दी प्राप्ति लई मैनूं संता दे प्रेम दी, दात बख्शिश कर, तां कि मैं, हे प्रभु! परमात्मा स्वरूप, ज्योतिरगुरू (सतिगुरु) संता पासों तेरियां ज्योतिर्ज्ञान भरपूर कथावां दा, मैं आनंद माण सकां, क्योंकि मैनूं गिआन हो गिआ है कि, तेरे ज्योतिर्ज्ञान नूँ केवल ते केवल साधु, सन्त महापुरुष ही जांणदे हन।
गुरु रविदास जी महाराज, तत्कालीन सभी सन्तों में, आयु में बड़े थे, ज्योतिर्ज्ञानी भी वही सर्वश्रेष्ठ थे, मगर प्यार, स्नेह, संम्मान और आदर सँगत को अधिक देते थे।
गुरु रविदास जी के बड़प्पन के बारे में प्रोफेसर लालसिंह आगे इसी शोध प्रबंध काव्य में वर्णन करते हैं कि:----
गुरु रविदास जी दे समकालीन महापुरुषां, सर्व सन्त ( गुरु कबीर जी, गुरु धन्ना जी, गुरु सेन जी, अते गुरु पीपा जी) आदि विचों गुरु रविदास जी उमर विच वी सभ तों बडे सन, अते ज्योतिर्ज्ञानी महापुरुषों दे रूप विच प्रसिद्ध, सभ तों बढ़ कर भी ओही सन। उहनां दी विश्व प्रसिद्धि का कारण, ब्राह्मणवादी हिन्दू समाज दा राजिआं महाराजिआं कोल आए दिन शिकायतां दा होणा सी। सब तों निंवीं ते अछूत जाति दे होण कर के गुरु रविदास जी महाराज दा ज्योतिर्ज्ञानी होंणा अते धर्मग्रँथ दा खण्डन करके उन्हां दे भगवानां, अवतारां, देवी, देवतियाँ आदि नूँ रद्द करना, ब्राह्मणा नूँ फुटि अख नहीं सी भांउँदा।
गुरु जी की प्रसिद्धि का सबसे बड़ा कारण, हर क्षेत्र में ब्राह्मणों के ऊपर जीत प्राप्त करके, चक्रवर्ती बादशाह (महाराजा) के रूप में, सिर पर छत्र का झुलाना था----
ऐसी लाल तुझ बिन कौन करै।
गरीब नवाज गुसैईंयां मेरे माथे छत्र धरै।।
इस प्रत्यक्ष प्रमाण और अटल सच्चाई ने उन की ज्योतिर्ज्ञान की प्राप्ति और प्रभु के मिलाप के सबूतों सहित, परिपक्वता के साथ दृढ़ किया है। जिस अटल सच्चाई को सभी सन्त महापुरुषों ने हंसते हुए स्वीकार कर लिया है। इसी कारण गुरु रविदास जी विश्व धर्म की पोथी के बीच केवल और केवल वही ज्योतिर्ज्ञान के मालिक और बिक्रेता दृष्टिगोचर हैं, बाकी दुनियाँ विकारों का ही व्यापार करती है। इस एलान के साथ यह भी एलान कर दिया गया है, कि उनकी वाणी का सृजन, रागों के स्वभाव अनुसार साधक के आत्मिक विकास की जरूरत अनुसार किया गया है।
भले ही ब्राह्मणों ने गुरु रविदास जी को हर कदम पर परेशान किया था, नित नए नए इलजाम लगा कर सत्य को असत्य के आवरण से ढकने के घोर अपराध किये हैं मगर , उन्हीं धूर्त लोगों की असफलता और निराशा, के कारण ही, गुरु रविदास जी का यश दिनोदिन बढ़ता ही गया। भले ही इन मूर्खों के झूठे षडयन्त्र होते थे, मग़र उस नेगेटिव दृष्टिकोण के कारण जो परिणाम निकलते थे,वे पॉजिटिव रूप धारण कर ही निकलते थे। यदि वे सिकन्दर लोदी के पास उनकी मुखबरियाँ नहीं करते तो, उनके सामने कौन बादशाह चल कर आता, और कौन आत्मसमर्पण करता? कौन उनके पाँव सोने की परात में धुलाता? कौन उन्हें अपना पीर मानता? कौन उनके आदेश का पालन करके, भारत मे बेगमपुरा बसाता? बादशाह बाबर को क्या जरूरत थी कि वह उनको मिलने कांशी जाता? क्यों उन्हें अपना राजगुरु बनाता? गुरु रविदास जी के खिलाफ जितनी विवादित कथाएं, झूठी घटनाएं ब्राह्मणों द्वारा ही तैयार करवाईं गई हैं, उनसे गुरु जी को कोई हानि नहीं हुई अपितु विश्व में गुरु जी का सम्मान ही बढ़ा है। इसीलिए गुरु जी, प्रत्येक आदमी को ही सत्पुरुष की मान्यता देकर सम्मानित करते है, भले ही वे सकारात्मक कार्यों के कारण इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज किये गए हों, या नकारात्मक कार्यों के कारण षड्यंत्रकारी बन कर, इतिहास के पन्नों पर कलंक बन कर ही दर्ज हुए हों।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदिधर्म मंडल।
अगस्त 10, 2020।
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