वुरु रविदास साहित्य, महाक्रांति का दर्पण।।
।।गुरु रविदास साहित्य, महाक्रांति का दर्पण।।
गुरु रविदास जी ने जिस वाणी की रचना की है वह, साक्षात, महाक्रांति का जीता जागता साहित्यिक दर्पण है, क्योंकि साहित्यकार अपने समय का प्रतिनिधि होता है। अपने समय की समस्याओं, भावनाओं और विचारों को ही व्यक्त करता है। साहित्यकार अपने समाज के सुखों दुखों से प्रभावित होता है और अपनी सृजनात्मक शक्ति से अपने भावों को जन जन तक पहुँचाता है। वह अपने समाज, जाति और कबीले का वकील बन कर उनकी व्यथा, दुख, दर्द, खुशी और गमी में शामिल होकर, उन की जन भावनाओं को अपनी लेखनी के माध्यम से व्यक्त करता रहता है। सुप्रसिद्ध लेखक और आलोचक ग्लैडस्टोन जी, ( Gladstone) ने लिखा है:--- The effective public speaker receive from audience in vapour what he pours back on them, in flood. अर्थात वक्ता भाप के रूप में जिन विचारों को अपने श्रोताओं से लेता है, उन्हीं विचारों को अति मूसलाधार वर्षा के रूप में, अपने श्रोताओं को देता है, यही बात साहित्यकार के लिए भी चरितार्थ होती है। वह अपने समाज के जिन जिन भावों और विचारों को ग्रहण करते हैं, उन को सुंदर भाषा से अलंकृत कर समाज को देता है। इसलिये निश्चित रूप से कहा जा सकता है, कि यदि किसी समाज का दर्शन करना हो, उस का सच्चा साफ साफ दर्पण देखना हो, तो तत्कालीन बहुमुखी साहित्य का अध्ययन करना चाहिए, इसी साहित्य को समाज का दर्पण कहा गया है, उसमें किसी समाज के रीति रिवाजों संघर्षों, मान्यताओं, परंपराओं और चिंताओं का प्रतिबिंब मिलता है।
राम वृक्ष बेनीपुर, पुस्तक "मील के पत्थर" में लिखते हैं कि, सरहपा से लेकर वर्तमान समय तक हमारे, इन दस बारह सौ वर्षो के लम्बे, दीर्घकालिक साहित्यिक इतिहास में हमारे समाज की जीती जागती तस्वीर है। इसके दरमियान समाज जिस तरह सोया, जिस तरह उसने करवटें बदली ,कभी उठा कभी फिर चादर तान कर सो गया, ठोकरों ने, फिर जिस तरह जगाया और आज वह जिस कशमश में है, सबके अलग अलग प्रकार के चित्र हमारे साहित्य में भरे पड़े हैं।
वास्तव में ही, वेनीपुरी ने सत्य के आधार पर ही, तर्कसंगत तरीके से कहा है, कि समाज कभी सो जाता है, कभी करबटें बदलने लगता है, कभी जाग जाता है, फिर कभी चादरें ओढ़ कर लंबी गहरी नींद सो जाता है, फिर ठोकरें लगती है, उनसे शर्म खा कर फिर उठता है, फिर चलने लगता है, फिर गिरता है और उठता है, फिर सो जाता है। यही क्रम चलता रहता है। इस जागने उठने बैठने के पीछे भी, सत्पुरुषों का विशेष योगदान ही हुआ करता है। भारत के इतिहास पर नजर डालें तो शिव के समय से ही इतिहास की, कुछ कुछ जानकारी मिलती है, वह भी यूरेशियन आर्यों की घुसपैठ ने सन्देहास्पद बनाई हुई है, सम्राट शिव को छलबल से मार कर उस ज्योतिर्ज्ञानी को मन्दिरों में कैद कर दिया, उसकी क्रांतिकारी पत्नी एवं साम्राज्ञी काली उर्फ गौरजां को यूरेशियन लोगों ने छलबल से शहीद कर उसे भी काली का रूप देकर, मन्दिरों में नजरबंद कर दिया, राजा बलि को छला और सत्ता छीन कर मनघड़ंत कथाएं संसार में फैला दीं, रावण, हिरण्यकश्यप, महिसासुर को भी कत्ल कर उनके इतिहास को भी नष्ट कर दिया, राजा महाराजा नन्द को विलासी सिद्ध कर उसे विषकन्याओं से मरवा दिया गया, राजा वृहद्रथ को भी अप्सरा के जाल में उलझा कर मार दिया, डाक्टर भीमराव अंवेदकर को सुंदरी के जाल में फंसाकर मरवा दिया, साहिब कांशीराम को भी त्रिया चरित्र में उलझा कर मार दिया गया। कई अवतारों का उदय भी हुआ और अस्त भी हुआ मगर नया सवेरा भी अवश्य हुआ। समय रुका, फिर चला, चल कर, फिर रुका और फिर चला मगर शैतान अपनी शैतानी कभी नहीं छोड़ता जो कुछ इन अवतारों का इतिहास सृजित हुआ है, उसकी नींव पर ही नया इतिहास रचा गया है। इन सभी आदर्श महापुरुषों ने अपने आप को नहीं संभाला और असमय में ही कालकवलित होते गए मग़र गुरु रविदास जी ने 151 सालों की लम्बी पारी खेली और षडयन्त्रकारियों को बुरी तरह नाकों चने चबाए। गुरु जी ने जातीयता की कटुता पर प्रहार करते हुए कहा:---
कहि रविदास खलास चमारा।
जो हम शहरी सु मीत हमारा।।
उन्होंने निःसंकोच कहा, कि हम खलास चमार हैं, जिससे उन्हें कोई भी मनुवादी अपने छलकपट में आत्मसात नहीं कर सका, ना ही कोई गुरु जी को विष्णु का अवतार घोषित करके, हमसे छीन सका। गुरु जी ने ब्राह्मणों के जातीयता के थोथे अहंकार को चूर चूर करने के लिए, जिस शिला के ऊपर जीवनदास जी जूते बनाते थे, उसी को नदी में तैरा कर, वहीं प्रकांड पंडितों को हरा कर, शास्त्रार्थ में जीत कर, सिर पर छत्र धारण करवा कर, मनुवादियों के कंधों पर, पवित्र कांशी तीर्थ की यात्रा की जिस के लिए गुरु रविदास जी, भगवान का धन्यवाद करते हुए कहते हैं:---
ऐसी लाल तुझ बिन कौन करै।
गरीब निवाजु गुसैइंयाँ मेरा।।
माथे छत्र धरै।।
गुरु रविदास जी ने, कभी भी मनुवादी छलियों के ऊपर विश्वास तक नही किया। सतगुरु कबीर साहिब भी मनुवाद के अत्याचारों से वहुत परेशान हुए थे, वे भी जातिवाद के घृणित कलंक पर कहते हैं कि:----
जात ना पूछो साध की, पूछ लीजिए ज्ञान।
मोल करो तलबार का, पड़ा रहन दो म्यान।ब्राह्मणों की सफेदपोशी पर तंज करते हुए कबीर साहिब फरमाते हैं कि:----
मन चोला तन उजला,बगुला कपटी अंग।
तासों कौआ भला, तन मन एकहिं रंग।
कबीर साहिब ने तत्कालीन ब्राह्मणवाद का सजीव चित्रण किया है, जो उस समय का दर्पण है। जो कुछ उपरोक्त्त महापुरुषों का इतिहास मिलता है, वह हमारे समाज का स्पष्ट और प्रांजल साहित्यिक दर्पण है।
रामसिंह आदवंशी।
आदि।
विश्व आदिधर्म मंडल।
अगस्त 09, 2020।
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