।।गुरु रविदास द्वारा जाति पाति खंडन क्रान्ति।।
।।गुरु रविदास द्वारा जातिपाति खंडन क्रांति ।।
गुरु रविदास जी महाराज ने, शांतिपूर्ण, क्रान्ति की कड़ी में जो अत्यंत क्रांतिकारी कदम उठाया, वह था, "भारतीय जातिपाति का खंडन"। गुरु जी का दर्शन प्रकृति के नियमों पर आधारित है। उनका मानना था कि जातियां तो पशुओं, वन्य प्राणियों, जलजीवों की ही हो सकतीं हैं, क्योंकि उनकी बोली, भाषा, अक्ल-शक्ल, रहन-सहन खाना-पीना अलग-अलग है, जबकि मॉनव के शरीर की बनाबट एक जैसी ही है, सभी अंग प्रत्यंग, नयन-नक्श एक समान है, फिर इंसानों की जातियां अलग, अलग क्यों ? अमीर-गरीब क्यों ? ऊंच-नीच क्यों ? छूत-अछूत क्यों ? इसीलिये उन्होंने जातपात का तर्कपूर्ण खंडन करके इंसान को इंसान बनकर रहने केलिये, समरसता का पाठ पढ़ाया:-----
ब्राह्मण खत्री वैश सूद रविदास जन्म ते नाहिं।
जौ चाहि सुबरन कोउ, पावई करमन माहिं।।
गुरु जी फरमाते हैं कि, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, सूद कोई भी जन्म से नहीं है, सभी वर्ण जिस व्यवसाय को अपनाते है, वह उसका भरण पोषण का साधन मात्र ही है, वह उसकी जाति नहीं बन जाती।
जातपात मत पूछिए, का है जात अरु पात।
रविदास पूत सब प्रभुके,कोउ नहीं जात कुजात।
गुरु जी समझाते हैं कि, जातिपाति मत पूछो, क्या जात और क्या पात है, सभी आदिपुरुष की संतान है, कोई जात कुजात नहीं है। सन्त शिरोमणि गुरु रविदास जी आगे कहते हैं कि:---
वेद पढ़ई पण्डित बनयो, गांठ पनहीँ तोउ चमार।
रविदास मानुस इक़ होई, नामहिं धरै हुई चार।।
वेद शास्त्र पढ़ने वाले खुद ही ब्राह्मण बन बैठे हैं, जूते गांठने वालों को चमार कह कर अपमानित किया जाता है, जो प्रकृति के नियमानुसार उचित नहीं है। जातियों के चार नाम क्यों रखे गए हैं ?
रविदास जनम के कांरने होत ना कोउ नीच।
नर कूं नीच करी डारी है,ओछे कर्म की कीच।।
गुरु रविदास जी पुनः फरमाते हैं कि, जन्म के आधार पर कोई भी छोटा-बड़ा, ऊंच-नीच नहीं होता, आदमी नीच अपने कर्मों के कीचड़ से ही होता है।
नीच नीच कर मारहिं, खल जानत नहीं नादान।
सब का सिरजनहार है, रविदास एको भगवान।
मूर्ख नही जानते कि, सभी काम करने केलिये हैं, समाज को चलाने केलिये जरूरी हैं, फिर नीच नीच कह कर किसी को, क्यों दुखी करते हो, उन्हें क्यों मारते हो, रविदास जी फरमाते हैं कि, सभी को बनाने वाला एक ही निरंकार है।
रविदास ब्राह्मण मत पूजिए, जोऊ होवे गुनहीना।
पूजिए चरण चंडाल के, जोऊ होवे गुण प्रवीन।।
गुरु रविदास जी ब्राह्मणों के एकाधिकार को चुनोती देते हुए फरमाते हैं, कि उसी को आदर्श व्यक्ति मानना चाहिए जो गुणवान हो। किसी भी जाति विशेष को ये सम्मान नहीं देना चाहिए। गुरु जी आगे मॉनव को मार्ग बताते हुए अति तर्कसंगत भावों में कहते हैं:-----
जल की भीत पवन का थंभा रकत बूंद का गारा।
हाड़ मांस नाड़ी कोउ पिंजर पंखी वसै बिचारा।।
प्राणी क्या तेरा मेरा जैसे तरवर पंखी बसेरा।।
राखुहुँ कन्ध उसारहु नीवां।
साढ़े तीन हाथ तेरी सीवाँ।।
बांके बाल पग सिर तेरी।
इह तन होइगो भसम की ढेरी।।
ऊँचे मंदिर सुंदर नारी।
राम नाम बिन बाजी हारी।।
जात कमीनी पात कमीनी,
ओछा जनम हमारा।
तुम शरणागति राजा रामचंद,
कहि रविदास चमारा।।
गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि, जल, वायु, अन्न, अग्नि से ये शरीर बना हुआ है, जिसके बीच वायु से श्वास आते हैं, जिनसे ये पिंजर चलता है, मेरा तेरा क्यों करता ? तेरी तो तीन हाथ की सीमा है जिसमे, तेरा शरीर जलकर राख हो जाता है। इसीलिए, वे संसारिकता को क्षणिक बताते है। वे आपस मे सौहार्दपूर्ण वातावरण में जीवन के सफर को तय करना सिखाते हैं। आदमी की क्या सीमाएँ हैं ? क्या औकात है ? विस्तार से समझाते हैं। साधु समाज के लिए, वर्ण-अवर्ण और जात-पात पर प्रकाश डालते हुए, गुरु रविदास जी फरमाते हैं:-----
जिह कुल साधु वैष्णों होई।
वर्ण अवर्ण रँकू नहीं ईसरु।
विमल जासु जानिए जग सोई।।।रहाउ।।
ब्रह्ममण वैश्य शूद अरु खत्री,
डोम चंडाल मलेच्छ मन सोई।।
होई पुनीत भगवंत भजन ते,
आपु तारि तारे कुल दोई।।
धंनि सोऊ गाँउ धंनि सोऊ ठाऊँ,
धंनि पुनीत कुटंभ सभ लोई।।
जिनि पीया सार रस तजे आन रस,
होई रस मगन डारे विखु खोई।।
पंडित सूर छत्रपति राजा,
भगत बराबर अरु ना कोई।।
जैसे पुरान पात रहै जल समीप,
भणि रविदास जनमे जगि ओई।।
गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि, साधु-सन्त, जात- कुजात कोई कुछ नहीं हैं, जो भगवान का भजन करे वही अपने कुल और खुद को तार लेते हैं। वही गाँव धन्य है, जहां सभी रसों को त्याग कर, लोग अपने प्रियतम के रंग में रंगकर, उसी के भजन में मगन होकर सभी विषय विकारों को त्याग दिया है। सन्त शिरोमणि गुरु जी ने छोटे बड़े को समदृष्टि से देखते हुए, महारानी झालाबाई के ठाटवाट, श्रृंगार और पहरावे को देखकर, उसे बुरी तरह फटकारते हुए कहा:----
तुझहिं सुझन्ता कछू नाहिं।
पहिरावा देखे ऊभि जाहिं।।
गरववती का ठाऊँ।
तेरी गरदनि ऊपरी लवै काऊ।
गुरु रविदास जी ने कभी भी सत्य को, धराशायी होकर, नीचे गिरने नहीं दिया, वे अमीर-गरीब, राजा-महाराजा, बेगम-बादशाह को उनकी गलतियों केलिये कड़ी फटकार लगा देते थे, जिससे गुरु रविदास जी के साहस, शौर्य, हिम्मत देखते ही बनते है।।सोहम।।जय गुरुदेव।।
गुरु रविदास जी महाराज ने, शांतिपूर्ण, क्रान्ति की कड़ी में जो अत्यंत क्रांतिकारी कदम उठाया, वह था, "भारतीय जातिपाति का खंडन"। गुरु जी का दर्शन प्रकृति के नियमों पर आधारित है। उनका मानना था कि जातियां तो पशुओं, वन्य प्राणियों, जलजीवों की ही हो सकतीं हैं, क्योंकि उनकी बोली, भाषा, अक्ल-शक्ल, रहन-सहन खाना-पीना अलग-अलग है, जबकि मॉनव के शरीर की बनाबट एक जैसी ही है, सभी अंग प्रत्यंग, नयन-नक्श एक समान है, फिर इंसानों की जातियां अलग, अलग क्यों ? अमीर-गरीब क्यों ? ऊंच-नीच क्यों ? छूत-अछूत क्यों ? इसीलिये उन्होंने जातपात का तर्कपूर्ण खंडन करके इंसान को इंसान बनकर रहने केलिये, समरसता का पाठ पढ़ाया:-----
ब्राह्मण खत्री वैश सूद रविदास जन्म ते नाहिं।
जौ चाहि सुबरन कोउ, पावई करमन माहिं।।
गुरु जी फरमाते हैं कि, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, सूद कोई भी जन्म से नहीं है, सभी वर्ण जिस व्यवसाय को अपनाते है, वह उसका भरण पोषण का साधन मात्र ही है, वह उसकी जाति नहीं बन जाती।
जातपात मत पूछिए, का है जात अरु पात।
रविदास पूत सब प्रभुके,कोउ नहीं जात कुजात।
गुरु जी समझाते हैं कि, जातिपाति मत पूछो, क्या जात और क्या पात है, सभी आदिपुरुष की संतान है, कोई जात कुजात नहीं है। सन्त शिरोमणि गुरु रविदास जी आगे कहते हैं कि:---
वेद पढ़ई पण्डित बनयो, गांठ पनहीँ तोउ चमार।
रविदास मानुस इक़ होई, नामहिं धरै हुई चार।।
वेद शास्त्र पढ़ने वाले खुद ही ब्राह्मण बन बैठे हैं, जूते गांठने वालों को चमार कह कर अपमानित किया जाता है, जो प्रकृति के नियमानुसार उचित नहीं है। जातियों के चार नाम क्यों रखे गए हैं ?
रविदास जनम के कांरने होत ना कोउ नीच।
नर कूं नीच करी डारी है,ओछे कर्म की कीच।।
गुरु रविदास जी पुनः फरमाते हैं कि, जन्म के आधार पर कोई भी छोटा-बड़ा, ऊंच-नीच नहीं होता, आदमी नीच अपने कर्मों के कीचड़ से ही होता है।
नीच नीच कर मारहिं, खल जानत नहीं नादान।
सब का सिरजनहार है, रविदास एको भगवान।
मूर्ख नही जानते कि, सभी काम करने केलिये हैं, समाज को चलाने केलिये जरूरी हैं, फिर नीच नीच कह कर किसी को, क्यों दुखी करते हो, उन्हें क्यों मारते हो, रविदास जी फरमाते हैं कि, सभी को बनाने वाला एक ही निरंकार है।
रविदास ब्राह्मण मत पूजिए, जोऊ होवे गुनहीना।
पूजिए चरण चंडाल के, जोऊ होवे गुण प्रवीन।।
गुरु रविदास जी ब्राह्मणों के एकाधिकार को चुनोती देते हुए फरमाते हैं, कि उसी को आदर्श व्यक्ति मानना चाहिए जो गुणवान हो। किसी भी जाति विशेष को ये सम्मान नहीं देना चाहिए। गुरु जी आगे मॉनव को मार्ग बताते हुए अति तर्कसंगत भावों में कहते हैं:-----
जल की भीत पवन का थंभा रकत बूंद का गारा।
हाड़ मांस नाड़ी कोउ पिंजर पंखी वसै बिचारा।।
प्राणी क्या तेरा मेरा जैसे तरवर पंखी बसेरा।।
राखुहुँ कन्ध उसारहु नीवां।
साढ़े तीन हाथ तेरी सीवाँ।।
बांके बाल पग सिर तेरी।
इह तन होइगो भसम की ढेरी।।
ऊँचे मंदिर सुंदर नारी।
राम नाम बिन बाजी हारी।।
जात कमीनी पात कमीनी,
ओछा जनम हमारा।
तुम शरणागति राजा रामचंद,
कहि रविदास चमारा।।
गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि, जल, वायु, अन्न, अग्नि से ये शरीर बना हुआ है, जिसके बीच वायु से श्वास आते हैं, जिनसे ये पिंजर चलता है, मेरा तेरा क्यों करता ? तेरी तो तीन हाथ की सीमा है जिसमे, तेरा शरीर जलकर राख हो जाता है। इसीलिए, वे संसारिकता को क्षणिक बताते है। वे आपस मे सौहार्दपूर्ण वातावरण में जीवन के सफर को तय करना सिखाते हैं। आदमी की क्या सीमाएँ हैं ? क्या औकात है ? विस्तार से समझाते हैं। साधु समाज के लिए, वर्ण-अवर्ण और जात-पात पर प्रकाश डालते हुए, गुरु रविदास जी फरमाते हैं:-----
जिह कुल साधु वैष्णों होई।
वर्ण अवर्ण रँकू नहीं ईसरु।
विमल जासु जानिए जग सोई।।।रहाउ।।
ब्रह्ममण वैश्य शूद अरु खत्री,
डोम चंडाल मलेच्छ मन सोई।।
होई पुनीत भगवंत भजन ते,
आपु तारि तारे कुल दोई।।
धंनि सोऊ गाँउ धंनि सोऊ ठाऊँ,
धंनि पुनीत कुटंभ सभ लोई।।
जिनि पीया सार रस तजे आन रस,
होई रस मगन डारे विखु खोई।।
पंडित सूर छत्रपति राजा,
भगत बराबर अरु ना कोई।।
जैसे पुरान पात रहै जल समीप,
भणि रविदास जनमे जगि ओई।।
गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि, साधु-सन्त, जात- कुजात कोई कुछ नहीं हैं, जो भगवान का भजन करे वही अपने कुल और खुद को तार लेते हैं। वही गाँव धन्य है, जहां सभी रसों को त्याग कर, लोग अपने प्रियतम के रंग में रंगकर, उसी के भजन में मगन होकर सभी विषय विकारों को त्याग दिया है। सन्त शिरोमणि गुरु जी ने छोटे बड़े को समदृष्टि से देखते हुए, महारानी झालाबाई के ठाटवाट, श्रृंगार और पहरावे को देखकर, उसे बुरी तरह फटकारते हुए कहा:----
तुझहिं सुझन्ता कछू नाहिं।
पहिरावा देखे ऊभि जाहिं।।
गरववती का ठाऊँ।
तेरी गरदनि ऊपरी लवै काऊ।
गुरु रविदास जी ने कभी भी सत्य को, धराशायी होकर, नीचे गिरने नहीं दिया, वे अमीर-गरीब, राजा-महाराजा, बेगम-बादशाह को उनकी गलतियों केलिये कड़ी फटकार लगा देते थे, जिससे गुरु रविदास जी के साहस, शौर्य, हिम्मत देखते ही बनते है।।सोहम।।जय गुरुदेव।।
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