।।गुरु रविदास औरमृत्यु का समय व सच।।

।।गुरु रविदास जी और मृत्यु का समय और सच।।
गुरु रविदास जी महाराज ने, मूलनिवासियों के जीवन और मृत्यु को भी बड़ी बारीकी से समझा, परखा और उसके सभी पहलुओं पर चिंतन किया था, जिसके बारे में किसी ने भी ना तो गूढ़ अध्ययन किया और ना ही रिसर्च की है। मनुस्मृतियोँ में वर्णित कानून ही जीवन और मौत का निर्णय करते हैं, जो जो कानून इन झूठ के पुलिंदों में निश्चित किए गए हैं, वही राजपूत, वैश्य और शूद्रों केलिये यमराज है। मनुस्मृति में लिख हुआ है कि:-----
एकाजातिद्रविजातिस्तु वाचा दारूण या क्षिपन।
जिह्नया:प्राप्नुयाच्छेदन जघण्यप्रभवो हि स:।। (मनु,8-269)
शूद्र द्वारा द्विजातियों को अपशव्द कहा जाए तो उसकी जिह्वा काट लेनी चाहिए, ऐसे अधम केलिये यही दंड उचित है।
नामजातिग्रह तवेषामभिद्रोहेण कुर्बत:।
निक्षेपयोमय: अंकुज्वर्लननास्य दशांगुल:।मनु 0,8-270)
यदि शूद्र प्रभाव के अहंकार में द्विजातियों के नाम व जाति का उपहास करता है, तो आग में तप्त दस उंगली शालिका (लोहे की छड़) उसके मुंह में अति गर्म गर्म डाल देनी चाहिए।
धर्मोपदेशं दर्पेंण  विप्रणामस्य कुर्बत:।
तप्तमासेचयेतैलँ वक्तृ श्रोते च पार्थिव:।।
यदि सूद्र घमण्ड में आ कर द्विजातियों को धर्मोपदेश देने की धृष्टता करे तो तत्काल राजा उसके मुंह व काम मे ख़ौलता हुआ तेल डलबा दे। 
वास्तव में यही कानून शूद्रों के जीवन और मृत्य को सुनिश्चित करते थे, यहां कोई भी न्याय संगत, तर्कसंगत नियम या विधान भी नहीं था, जिसके द्वारा मानव जाति को सजाए मौत दी जा सके, केवल वर्ण ही किसी की जिंदगी और मृत्यु को सुनिश्चित करता था।मान लेते यही नियम भी उचित थे, तो फिर चारों वर्णों के, हर व्यक्ति को इन्हीं के द्वारा दंड दिया जाना चाहिए था, जिस प्रकार साउदी अरब में सजाए मौत सरेआम दी जाती है चाहे कोई किसी भी धर्म का हो मगर भारत में केवल उस शूद्र वर्ग को ये दंड निश्चित करना और मारना  कहाँ तर्कसंगत था ? जो तीनों ही वर्णों को अंदर बैठकर खाना खिलाता था, एक तो जो सेवा करता हो, पेट भरने केलिये सभी वर्णों को अनाज पैदा कर के देता हो, उसे ही दोहरा दंड! ऐसा क्यों?
गुरु रविदास महाराज का अवतार ही इसी कारण हुआ था, क्योंकि इन्हीं अनाचारों से आदिपुरुष का सिंहासन हिल चुका था। हिमाचल प्रदेश के नादौन कस्बे में एक शूद्र दुल्हन को इसीलिए जिंदा जला दिया था कि, उसने लाल रंग के कपड़े पहने हुए थे, जिससे मनुस्मृतियोँ के काले कारनामे आज भी जगजाहिर होते रहते हैं। गुरु रविदास जी महाराज ने, जीवन और मृत्यु सत्यता के बारे में अपनी क्रांतिकारी वाणी में लिखा है:----
रविदास जनमे कउ हरष का, मरने का कउ सोक।
बाजीगर के खेल कूँ कोउ, समझत नाहिं लोक।।
जीवन जोति कैसे जगि, कैसे होइ इसका अंत।
रविदास मनुष ना जानहिं, जानत है वस  भगबंत।।
गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि, जन्म की क्या खुशी और मृत्यु का क्या दुख  है? ये बाजीगर का खेल है जिसे लोग नहीं जानते हैं। ये जीवन का प्रकाश कैसे हुआ, इसे भी मनुष्य नही जानता है। जीवन का कैसे अंत होता है, इसे केवल भगवान ही जानता है। गुरु जी फरमान करते हैं, कि वह मनुष्य के कर्मो के अनुसार ही सभी को सुख और दुख देते हैं। अगर हम भी पिछले कल तक नजर दौड़ाएं तो ज्ञात हो जाएगा कि, जिस किसी मनुष्य ने जैसे जैसे अच्छे, बुरे कर्म किए हैं वैसे वैसे ही फल,मृत्यु से पूर्व भोगे हैं और तभी प्राण पंखेरू निकलते हैं। मनुस्मृति के काले नियम केवल भारत में ही असमय में किसी की मौत कारण बनते हैं। गुरु रविदास जी ही मानवता के सन्देश देते हुए, सभी प्राणियों की समरसता की वकालत करते हैं, वे मनुस्मृति द्वारा दण्डित लोगों की मृत्यु को वास्तविक मृत्यु नहीं मानते हैं।
।।सोहम।।जय गुरुदेव।।
रामसिंह शुक्ला।
अध्यक्ष।
विश्व आदिधर्म मंडल।
जुलाई 5, 2020।

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