।।गुरु रविदास औऱ मूलनिवासी शूरवीर।।
।।गुरु रविदास और मूलनिवासी शूरवीर।।
गुरु रविदास जी महाराज ने, भारतीय मूलनिवासियों की, गुलामी का कारण केवल आपसी एकता का अभाव और सामूहिक रूप से इकठ्ठे होकर, अत्याचारों का विरोध ना करके, खून का बदला खून से ना लेना ही महसूस किया था। क्योंकि लोग भी कहते हैं कि,"कलियुगे संघे शक्ति" कलियुग में अगर कोई जाति समुदाय एकता स्थापित कर के, संगठन बनाकर रहते हैं, तो उनकी ओर कोई भी माँ का सपूत आंख उठाकर देखने की हिमाकत नहीं करता है। भारत के मूलनिवासी तो 6743 जातियों में विभाजित किए गए हैं, जिसके कारण वे गुलामी के शिकार बने हुए हैं। गुरु जी ने सबसे पहले तो अपने आप ही ब्राह्मणों द्वारा पददलित शूद्रों केलिये जंग लड़ना शुरू की थी, मगर जिनके लिए ये युद्ध शुरू किया था, उन्हें भी इस जंग में शामिल करना जरूरी समझा। इसीलिए उन्होंने शूद्रों को आपस में एकता स्थापित करने केलिये कहा:-----
।।शव्द।।
तुम चन्दन हम एरंड बापुरो,
संगि तुमारे बासा।
नीच रूख ते ऊच भए हैं,
सुगन्ध निवासा।।
माधउ सत संगति सरनि तुम्हारी।
हम अउगन तुम उपकारी।।रहाउ।।
तुम मखतूल सुपेद सपीअल,
हम बापुरे जस कीरा।।
सतसंगति मिलि रहिए माधउ,
जैसे मधुप मखीरा।।
जाति ओछी पाति ओछी,
ओछा जनम हमारा।।
राजा राम की सेव ना कीन्हीं,
कहि रविदास चमारा।।
गुरु रविदास जी ने इस शव्द के माध्यम से संगत को अपनी दयनीय दशा का वृत्तांत भी बताया है और एकता के सूत्र में बंधने केलिये भी कहा है कि, हमें उसी तरह रहना चाहिए, जिस प्रकार मधुमखियां, मिलजुल कर रहती हैं। उनका कहने का भावार्थ यही है कि अगर आप छः हजार जातियों में ही विभक्त रहे और एकता बनाकर नहीं रहे तो ब्राह्मण आपका शोषण करते ही रहें गे। तुम्हारी गुलामी को कोई खत्म नहीं करेगा।तुम्हारा खून बहता ही रहेगा। जिस प्रकार मधुमखियां अपनी नेत्री के आदेश से, सभी काम करती हैं, वैसे ही आप भी एक नेता चुनकर उसके आदेश का शतशः पालन करने केलिये तैयार रहो। जैसे ही कोई भी मधुमखियों से छेड़ता है, सभी मिलकर उसे उस समय तक खाती रहतीं हैं,जब तक वह मर नहीं जाता। आपकी दुर्दशा का कारण ही एकता की कमी ही है। जिस कौम को बलिदान करने का जज्वा नहीं होता, वह कौम हमेशा गुलामी और अत्याचार ही सहन करती है। जिस कौम का एक पँथ, एक ग्रन्थ नहीं होता, जो कौम इनकी रक्षा के लिये मर मिटने केलिये तैयार नहीं रहती, वह कौम गुलाम ही रहती है। इसीलिए स्वामी ईशरदास जी, गुरु आदिप्रकाश ग्रँथ में लिखते हैं कि, पँथ, ग्रँथ की रक्षा केलिये, मरना भी पड़े, तो मर जाना चाहिए, ना कि अहिंसा का गीत गाते रहना चाहिए:----
।।शव्द पीलो।।
मर जा धरम दे कारने, जिन्द जांदी तां जाण दे।
बार बार आणा ना इस भव, कहां जाएँ तेरे हाण दे।।
धरम दी खातर पाई शहीदी, सो दरगाह मध ना हांण दे।
मरना जीणा इक कर जाणे, जावण जवाल लोध ना माण दे।।
रविदास सोई कायर कहावण, शव्द गोली तन ना ताण दे।।
गुरु रविदास महाराज के शव्दों में स्वामी ईशरदास जी वीर रस में शूरवीर का वर्णन करते हैं कि, हे आदिधर्मी ! यदि तूँ सचमुच वीर है तो, समाज के ऊपर होने वाले अत्याचारों केलिये, धर्म पर आंच आने पर मर मिट जा, अगर प्राण भी जाते हैं तो जाने दो। जो शहीद हो जाते हैं, उन्हें इस धरती पर तो सम्मान मिलता ही है, वे दरगाह में भी मान प्राप्त करते हैं।जो ऐसे समय पर सीने पर गोलियाँ नहीं खाते, वही कायर, बुझदिल और निर्लज होते हैं। अगली चोपाई में फिर स्वामी ईशरदास जी लिखते हैं कि:----
।।शलोक।।
शूरवीर सोई जाणीऐ, जउ लड़ै लड़कहूँ दल माँहैं।
भन रविदास जो भाग गया, सो तऊ शूरा नाहैं।।
आप मरे जऊ मार लए, छाडे कबहूँ ना खेत।
भन रविदास काटै कर, फिर भी रहै शूरा सुचेत।।
शूरा तिल तिल कट हो जाई, निज मरे मन धरे ना शोक।
सुन रविदास सोई शूरवीर है, भले कहेंगे सभ लोक।।
निज मूए तउ मुकत है, दल काटे तां भी मोख।।
सुन रविदास सो सूरमा लागे, काहू ना लागे दोख।
आपा मारे मन मारा दल दिल कै वेपरवाह। सुन रविदास संग्राम करो,होकर वेपरवाह।।
स्वामी ईशरदास जी महाराज, के शव्दों में गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि, जो व्यक्ति सेना के बीच रह कर युद्धभूमि में लड़ते हैं, वही सच्चे अर्थों में बहादुर होते हैं और उन्हें ही शूरवीर जानना चाहिए। गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि, जो समरभूमि से भाग जाता है, वह तो शूरवीर नहीं होता है, वीर बहादुर तो, दुश्मन को मार देता है और अपने आप भी मर जाता है, मगर वीर बहादुर कभी भी रणभूमि नहीं छोड़ता है। गुरु रविदास जी कहते हैं, कि वह वीर बहादुर, दुश्मन का कत्ल करके भी, सचेत और चौकन्ना रहता है। शूरवीर, जरा, जरा कट जाता है, वह खुद भी मर जाता है मगर मन में कोई दुख अनुभव नहीं करता है। गुरु रविदास जी कहते हैं, कि अच्छे लोग उन्हीं को बहादुर कहते हैं।यदि वह स्वयं ही शहीद हो जाए, तो अपनी मुक्ति समझता है और सेना का कत्ल कर दे तब भी मोक्ष ही मिलता है।गुरू रविदास जी फरमाते हैं कि, जो संग्राम करते हुए, किसी भी व्यक्ति को दोष नहीं लगता है, वही शूरवीर लगता है।इस प्रकार खुद भी युद्ध भूमि में शहीद हो जाता है और बेपरवाह हो कर मन को, मार कर,मन मे वश में करता है, मरता है। गुरु रविदास जी कहते हैं कि,युद्ध करते समय, युद्ध निडर हो कर ही लड़ना चाहिए।
।सोहम।।जय गुरुदेव।।
रामसिंह शुक्ला।
अध्यक्ष।।
विश्व आदिधर्म मंडल।
जुलाई 4,2020।
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