।।गुरु रविदास और गुरु आदिप्रकाश ग्रँथ।।

             ||रविदास गुरु ना हुंदा||
कौण वेद पढ़न नूं देंदा ।।शब्द।।
कर साधन होत ज्ञान, ज्ञान तो नाम, नाम ते मुक्ति भए|| पिरथम संगत गुरु की कारण काज दोई || कारण संगत को भी कर्म कमावे कोई|| करन उपासना अमान उपासना बल ध्यान कर्म भग जान गुरां की जुगत भए | कर्म करे तो उपासना उपासना तो ज्ञान|| ज्ञान को रोचक जथारथा तुरिया पद को पान|| शव्द रूह को मलान नैन मूंद दोई को कील जवान ते नैण तुरिआ पद भगत. गए ||
||शव्द तर्ज गड्डी ||
जात पात रब नी जाणदा भक्ति कबूल करदा सोई जप लए|| जोई जपले सोइ जग तर गए रूप ना करूप देखिआ नारी पुरुष नाम लेइ चर गए|| नारी पुरुष ना प्रेम प्यार हरि नूं, संकट कट लए|| संकट कटलै अपने पिआरिआं दे गर्व तोड़ लए हँकारिआ बन्दिआं दे ||पत्थर तारदे गुरु रविदास दे पिआरिया ||संगतां तर गईंआं लग चरणी अभिमानी दूर बैह गए पिछाँ हटके||
||शव्द जोग ||
अज आ के गुरां दुआरे जी दिल दे दुख सारे फोलें| कोई जीव सखणा चलीती इस कीट करमां मरीति || लख-लख जल जीव डारे जी, रहे निशदिन काल के गोले|| शुभ कर्म ना करारे दुखड़े अपरंपारे जी, भले भाग जे मानुष जन्म पारे जी ||उत्तम जूनी सदाइयो अगियान अवर्ण भगति दबाइयो सतिगुर शरण पधारियो जी || समूह दुख बीते जोई सुणाए ओखद रूदी गुरु बचाई अर्ज जतीम पुकारे जी || करता करम गुरु करोए सत्पुरुष जाणी जाण सुणीदे|| सूत कसूत कोरी ज्यों उनीदे बिगड़ी गुरु सवारे जी रविदास जीव अणभोले ||


||शव्द ||
|| श्री गुरु आदि प्रगाश आरंभ, ते छपबाई का ||
1. श्री गुरु आदि प्रगाश हरि की थापना अनुभव ख़ास || ऊँने गुरु सरसे उदियाना || सिंघ वियाघर के अस्थाना || दास तास उबट जपनामा इस विध थापना अनुभव रामा || सोह्म सबद ध्यान धरे, दुध दि सेवा रुलिआ करहे|| मम लघ सेवक लग ग्रंथा अनसाहा|| सो आन लिओ गन पंथा || लघु पारस होवत छू तर लोह तांबर छोह हेम भंथा || मम कीटी कुंडा दरिआ ही बीड़ करन मैं ना आन पनाही || दास की सेवा गन बन आवे अनुरागी अनुराग से पढ़ाए || लघ पुस्तक बेखना विचार के ऐंवे बही ना जाणा खलार के || संस्कृत फ़ारसी लघ पाई भाषा पंजाबी जवान मलाई || संस्कृति सारी सकल ग्रन्थ आदि आदि प्रगाश सुगम विचारे || किते किते गुहड़ जो गल होसी इनके मध मे ज्ञान बही होसी || इनके गुण जो धारे उहो ही मोक्ष पावत हरि के दुआरे || कई इतिहासों की इह साखी संत भगत गुर पीर लाखी || पिरथमे लगणा कईआं नूं कड़बा नीम चरैता गलो ज्यों आमला || कड़बी ओषद सेहत बनाबे, पिरथमे कड़बी पर सुख दिलाबे ||
2. ||शलोक ||
3. सम्मत 1985 विक्रमी कतक महीना चढ़िया | अादधर्म दे मंडल भनहे ग्रंथ आरंभ जो करिआ, ना स्कूली पढ़न पियो ना डिग्रियां पास अनुभव हरि ने बख़शिया लिखावण आ रविदास | इक मन होइ धियान धरां दरसन गुरु दलाई l इक माह बरस बाद गुरु करात कच्ची लखाई l बांग चकोर दास मम तड़फिआ जल बिन मीन l आदि प्रगाश छपे किन्वे ना मन करे यकीन l श्री गुरु रविदास जी चार बजे निश आए सतगुरु मम यों क्यों दुविधा चित पाई? ना माया मम यों किहा ना पनाही कोई l सतगुरु हरिकी सेवा करि प्रचलित किवें कर होइ सतगुरु रविदास जी दीन्हा थाप मम हाथ| सन ऊनि सौ सतबंजा जाई के प्रचलत करे नेह नाथ, श्री गुरु रविदास जी थापना देकर गए ज़ब, सन चुरंजा बीतदा मन यकीन पाए कछु तब | श्री गुरु रविदास जोत तिस का करां ब्यान, इन नैनों से देखां नूर अदभुत सूरत जान | सवरण सरूप सवरण होम है, सवरण मोरी होत | सवरण हीरे सवरन सकंदर सवरणी जगत जोत | जेकर अलीक कोई मानदा आ जाओ आदि दुआरे | जिस जुगति से कहूं देख लओ रविदास गुर को पिआरे |ज़ब सन सतबंजा आ गया पोह पुन दरस दिखावत | ईशरदास नूं सख्त हुक्म किया आदि प्रगाश छपबावत | जय गुरुदेव।।
रामसिंह शुकला।
अध्यक्ष।
विश्व आदिधर्म मंडल।।
 

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