।।गुरु रविदास महाराज और समाजवा।।

।।गुरु रविदास महाराज और समाजवाद।।
गुरु रविदास जी से पूर्व, सिन्धुघाटी की सभ्यता के बर्बाद होने पर, विश्व में कहीं भी लोकतंत्र नहीं बचा था। पांच हजार सालों से सारे संसार में जंगलराज चलता आ रहा था। सभी देशों में सभी धार्मिक नेता ही शासन चलाया करते थे,शासक तो नामात्र के ही राज्यों के मुखिया हुआ करते थे, अपराधियों को जो सजाएं दीं जाती थी वे,इन्हीं क्रूर कठमुल्लों, पण्डों, पुजारियों के  द्वारा ही सुनाई जाती थी। जिसके उदारहरण यीशु मसीह और मंसूर को दी गई फांसी, मुख्य रूप से जग जाहिर हैं, राम द्वारा ऋषि शंबूक को दी गई फांसी, जगजाहिर हैं। इन सभी कठमुल्लों के आगे शासकों की भी नहीं चलती थी, जिससे आदिपुरुष, भी परेशान ही महसूस हुए लगते हैं, परमेश्वर ने गुरु रविदास जी महाराज को पूर्ण शक्तियां देकर पापियों को शांतमय ढंग से, सीधे रास्ते पर लाने के लिये भेजा होगा, क्योंकि जिन राजाओं, महाराजाओं और निरंकुश बादशाहों के नाम से प्रजा डरती थी, उन्हें जिस शक्ति के चरण कमलों पर झुकते हुआ हुए देखा गया, वह गुरु रविदास ही सर्वोच्च ईश्वरीय शक्ति अनुभव होती है। चौहदवीं शादी में भारत में चारों ओर लूटपाट का दौर चल रहा था। इन्हीं क्रूर कठमुल्लों, निरंकुश बादशाहों की तलबारें, भारत में इस्लाम को स्वीकार करने केलिये, कत्लेआम करती जा रही थीं, मगर किसी भी धर्म के ठेकेदार की हिम्मत नहीं होती थी कि, उन्हें रोक सकें। ऐसे हालात में माई का सपूत, केवल एक ही निकला, जिन्हें गुरु रविदास जी के नाम से विश्व में जाना गया। गुरु रविदास जी महाराज ने, ब्राह्मणों को शास्त्रार्थ में, कांशी, दिल्ली और चितौड़गढ़ में कई बार परास्त कर दिया था, जिस की आहट दिल्ली दरबार तक पँहुच चुकी थी। दिल्ली दरबार में,गुरु रविदास महाराजजी को सिकन्दर लोधी ने तलब कर के, इस्लाम धर्म स्वीकार करने के लिए विवश किया मगर, रविदास महाराज ने, लोधी के प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया, जिससे सिकन्दर लोदी पागल हो गया और गुरु महाराज को दिल्ली स्थित तुगलकाबाद जेल में बंद कर दिया, जेल के दृश्य को देख कर, वह भी जब परास्त हो गया, तो हार कर, उन्हें गुरु स्वीकार कर लिया। सिकन्दर लोदी ने, अब शासन भी गुरु रविदास जी के आदेशानुसार करने की प्रतिज्ञा कर ली और गुरु रविदास जी से मार्गदर्शन करने के लिये, अनुनय विनय करने लगा था। गुरु रविदास महाराज ने अपने पहले ऐतिहासिक फरमान में, लोधी को आदेश देते हुए कहा कि:-----
ऐसा चाहूँ राज मैं, जहां मिलै सभन को अन्न।
छोट बड़ सभ सम वसै, तां रविदास रहै प्रसन्न।।
गुरु रविदास जी ने मात्र दो पंक्तियों का गुर मन्त्र और संविधान दिया और बादशाह सिकन्दर लोदी ने, उसी संविधान पर अमल करके, भारत में बेगमपुरा बसा दिया, जिसे ब्राह्मणों ने, अंग्रेजों के जाने के बाद उजाड़ दिया, मगर जर्मन दार्शनिक कार्ल मार्क्स ने उन्नीसवीं शताव्दी में, इन्हीं दो पंक्तियों को आधार बनाकर कम्युनिस्ट घोषणा पत्र और दास कैपिटल लिख कर संसार के कई देशों और करोड़ों लोगों पर,धर्मिक, सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक रूप से निर्णयात्मक असर डाला था। मार्क्स ने चार सिद्धान्त देकर, उन देशों की तकदीर बदल कर रख दी, जिन्होंने गुरु रविदास जी के बताए रास्ते का अनुकरण किया था। कार्ल मार्क्स के निम्न मुख्य सिद्धान्त हैं, जिन्हें रूस और चीन ने अपना कर, विश्व शक्ति बन कर, संसार को दिखा दिया है।
1राजनीतिककार्यक्रम:--कम्युनिस्ट घोषणा पत्र और अपने लेखों में मार्क्स ने पूंजीवादी समाज में वर्ग संघर्ष की बात की है और बताया है कि कैसे अंततः संघर्ष में सर्वहारा वर्ग पूरी दुनिया में बुर्जुआ वर्ग को हटा कर सत्ता पर कब्जा कर लेगा। उनके प्रतिष्ठित जीवनी लेखक ब्रिटेन के फ्रांसीसी वहीन कहते हैं, कि मार्क्स ने उस सर्वग्राही पूंजीवाद के खिलाफ दार्शनिक तरीके रखे, जिसने पूरी मानव सभ्यता को गुलाम बना दिया।
कार्ल मार्क्स ने, गुरु रविदास जी की दो पंक्तियों को आधार मान कर दो बड़ी बड़ी समाजवाद के सिद्धान्त की पुस्तकें लिख कर, विश्व में क्रांतिकारी परिवर्तन की नींव डाली जिसके कारण, विदेशियों ने, उनके यशोगान की कोई सीमा नहीं छोड़ी मगर जिस भारत देश में, समाजवाद की थ्यूरी को जन्म हुआ, जिस सिद्धांतकार गुरु रविदास जी के सिद्धान्तों ने,समूचे विश्व में क्रांतिकारी परिवर्तन करके, शोषक और शोषित वर्ग की दूरी कम की, अमीरी गरीबी का फासला कम किया, उसी अर्थशास्त्री के,सारे साहित्य को ही भारत के ब्राह्मणों ने आग को भेंट कर के अपने, अनुपम, हीरे रत्नों का अपमान कर डाला, मगर स्वामी ईशरदास जी महाराज ने ठीक ही लिखा हुआ है कि:----
                 ।।शव्द।।
जित्थे कदर नहीं, उत्थे हीरे लाल रुलदे।। कौडी मुल ना पाए, चाहे लख मुल दे।। 
हीरे लाल दी पहचान जाणे कोई जौहरी बेटड़ा, 
ओह की जांणदे पहचाणदे, जेहड़े लूण तोलदे। 
इन्हां बूटियाँ दी कदर रसैणी जाणदे।।
बेक़दरां दे कदमा बिच रुलदे। 
औखद कीमती पहचान जाणे वैद पूरा कोई।।
कच्चे वैद त्रिकुटियाँ दे बिच भुलदे।। 
जिम्हेँ सन्त सार जाणे गुरमुख कोई।। रविदास मूरखां से मध सन्त रुलदे।।
कार्ल मार्क्स की थ्यूरी ने बीसवीं शदी के प्रारंभ में, वही कर दिखाया था जिसकी उम्मीद की गई थी, 1917 ईस्वी में रूसी क्रांति, इस परिवर्तन का जीता, जागता प्रमाण है। मजदूरों ने वियतनाम, क्यूबा, चीन, रूस और अन्य कई देशों के शासकों को उखाड़ फेंका और निजी संपति और उत्पादन के साधनों पर कब्जा कर लिया। ब्रिटेन के स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में जर्मन इतिहासकार अल्ब्रेख्त रिसल कहते हैं, कि भूमण्डलीकरण के पहले आलोचक थे, कार्ल मार्क्स, जिन्होंने दुनियां में बढ़ती हुई, असमानता, गैरबराबरी की चेतावनी दी थी। 2007-08 में आई वैश्विक मंदी ने एक बार फिर उनके विचारों को प्रासंगिक बना दिया। 
2 मंदी का बार बार आना:---कार्ल मार्क्स का मानना है कि पूंजीवाद के कारण मंदी बार बार आएगी, जिसका समर्थन करते हुए अल्ब्रेख्त ने नीतियों को संतुलित रखने की सलाह दी हुई है।
3 अकूत मुनाफा और एकाधिकार:----- मार्क्स का ये तीसरा अहम सिद्धान्त है, अतिरिक्त मूल्य, ये वह मूल्य हैं जो एक मजदूर, अपनी मजदूरी के इलाबा पैदा करता है।
4  भूमण्डलीकरण और गैरबराबरी:---- भूमण्डलीकरण ही सभी समस्यों का समाधान नजर आता है जिससे गैरबराबरी खत्म हो सकती है। मार्क्स के अनुसार दुनियाभर में दो वर्ग हैं, जो सदा थे, सदा रहेंगे।
1 शोषक। 
2 शोषित।
दोनों ही सदा से रहे हैं और सदा रहेंगे मगर दोनों के बीच बढ़ता हुआ फासला दोनों के लिये घातक है, क्योंकि दोनों के बीच वर्ग संघर्ष चलता आ रहा है और कहीं चरम सीमा पर पहुँच गया तो दोनो को ही भारी हानि हो सकती है। मार्क्स के सिद्धांतों ने क्यूबा, उतर कोरिया वियतनाम, रूस चीन लाओस जैसे देशों को संपन्न बना दिया है मगर तानाशाही पनपती जा रही है,जो मनुष्यता के लिए घातक सिद्ध होती नजर आ रही है, भले ही अमेरिका जैसा देश चीन के कारण आर्थिक दृष्टि से मजबूत हो चुका है मगर तानाशाही के चलते जो चीन ने पाया है, वह जनता की स्वतंत्रता के लिए अति हानिकारक भी बन चुका है। संपन्न देशों के गरीब भी पिसते जा रहे हैं और कम्युनिस्ट देश का गरीब वहां की क्रूर तानाशाही का शिकार होकर, लाचारी की जिंदगी जीने को विवश है।
गुरु रविदास जी ने, दोनों ही तन्त्रों की सफलता के लिये मध्य मार्ग तलासा था, जिससे सभी आर्थिक, राजनैतिक, और सामाजिक दृष्टि से सुखी रह सकते हैं। गुरु जी ने, सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक सिद्धान्त, दो ही पंक्तियाँ लिखकर आदर्श शासन के लिए दिए मगर, उनके दोनोँ ही पहलुओं को इकठ्ठा करके दोनों धुरियाँ काम करती नजर नहीं आ रही है, जिससे पूंजीवाद और तानाशाही बढ़ती ही जा रही है, दोनों ही धुरियों के कारण जनता पिसती जा रही है, जनता का खून निचोड़ा जा रहा है, जनता दोनों ही तन्त्रों की इंसानियत विरोधी नीतियों से तंग आ चुकी है। मगर शासक वर्ग गुरु रविदास जी के सिद्धांत के अनुसार नहीं चला तो, वर्ग संघर्ष अपना विराट, विकराल रूप अवश्य धारण कर लेगा और विश्व के लूटेरे वर्ग के लिए घातक रहेगा क्योंकि जनसंख्या, शोषित वर्ग की अस्सी प्रतिशत है, जो शोषकों पर भारी पड़ सकती है, जब तक ये भारी पड़े तब तक शासकों को चाहिए कि, वे अपना काम करने का स्टाइल और इरादा बदल लें अन्यथा, गुरु रविदास जी की दो पंक्तियां, शासकों को ले डूबेगी।सोहम।जय गुरुदेव।।
रामसिंह शुक्ला।
अध्यक्ष।। 
विश्व आदिधर्म मंडल।
जुलाई 6, 2020।

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