।।गुरु रविदास के लुप्त पोथीसाहिब का रहस्य।।

गुरु रविदास जी का पूजनीय विश्व आदिधर्म ग्रँथ, "पोथीसाहिब" विश्व के किसी भी कोने में मौजूद नहीं है, इसलिए प्रश्न पैदा हो रहे हैं, कि ये सत्य नहीं है। जिसकी तर्कसंगत विवेचना भी अति आवश्यक हैं। गुरु रविदास जी 151 वर्ष तक भारत में ही नहीं अपितु विश्व में समग्र क्रान्ति की का बिगुल बजाते रहे, क्रान्ति की ज्योति जलाते रहे, जिसने संपूर्ण ब्रह्मंड को प्रकाशमान करके, प्रत्येक क्षेत्र में परिवर्तन की क्रांतिकारी लहर ही शुरू थी। विश्व के कोने कोने में,गुरु रविदास जी को पैगंबर के रूप में मान्यता मिलती जा रही थी मगर भारत के ब्राह्मण उनके जानी दुश्मन ही बने रहे। ये भी सत्य है कि, ब्राह्मण उनकी शक्ति और विद्वता का लोहा मानते जा रहे थे। उनके चमत्कारों को भुनाते भी जा रहे थे, मगर अन्तर्मन से ईर्षा, द्वैष की भठ्ठी में जलते ही रहे थे, कि एक चमार ने हमारे थोथे ज्ञान की धज्जियां उड़ाकर, हमारा खाना पीना, जीना हराम कर रखा है। इसी कारण उनके ज्योति जोत समाए जाने के बाद, उनके संपूर्ण साहित्य को, इन लोगों ने अग्नि को भेंट करके, अपनी ईर्षा की आग को शांत किया था, इसी कारण निरन्तर 151 वर्ष तक सत्संग प्रवचन करके, ज्ञान की वर्षा करने के बाद भी, उनकी रचनाऐं नाम मात्र की ही मिलती हैं। गुरु रविदास जी से बड़े केबल नामदेव जी ही थे जिनका जन्म विक्रमी सम्मत 1370 के आसपास ही हुआ था, कबीर साहिब का जन्म विक्रमी सम्मत 1455 में और सेन जी का जन्म विक्रमी सम्मत 1447 को हुआ था। नामेदव जी निर्धनता के कारण परिवार का निर्वाह भी कठिनता से ही करते थे। कबीर साहिब भी आर्थिक दृष्टि से परेशान ही नजर आते हैं मगर रविदास जी तो संपन्न थे, जिसके कारण वे आयु पर्यन्त, समाज सुधार में ही व्यस्त रहे, जिसके लिए वे कन्याकुमारी से लेकर ईरान, इराक तक पदयात्रा करते रहे, यदि वे आर्थिक रूप से विपन्न होते तो वे भी नामदेव, सेन और कबीर साहिब की तरह घरेलू समस्याओं में ही उलझे रहकर, रोटी की ही समस्याओं से जूझते रहते। गुरु रविदास जी की इन विशेषताओं को, ध्यान में रखकर, किसी भी चमार लेखक, कवि, गायक, चित्रकार ने तनिक भी, अपनी बुद्धि से काम नहीं लिया और छल प्रपंच सहित, ब्राह्मणों के लिखे तर्कहीन, इतिहास को ही आत्मसात करते हुए, अंधाधुंध अंधे बनकर अपने वाप को अपनी लेखनी से ही अपमानित करते आ रहे हैं।क्योंकि जो तथ्य मैंने एकत्र किए हैं, उनसे आप सहज ही अनुमान लगा सकते हैं कि, महामहिम गुरु रविदास जी के व्यक्तित्व को धूमिल करने केलिये, ब्राह्मणों ने क्या क्या षड़यंत्र किए थे।
गुरु नानकदेवजी जी महाराज, गुरु रविदास जी के शिष्य थे, जिन्होंने गुरु रविदास जी के कई बार बनारस जा कर दर्शन करके, उनके प्रवचन औऱ कीर्तन सुने, गुरु जी के चालीस शव्द मर्दाने से लिखवा कर ले आए थे ताकि वे भी पंजाब में आकर उनकी वाणी का दिव्य सत्संग कर सकें जिसका प्रमाण, गुरु ग्रँथ साहिब में अंकित 22 शव्द हैं बाकी 18 शव्दों को सिखों ने भी गुरु ग्रँथ साहिब में दर्ज करने उदारता नहीं दिखाई, क्योंकि भाई गुरदास भी गुरु रविदास जी को केबल चमार ही समझ कर हीनता की गन्दी सोच मन में पाले हुए थे, इसी कारण उसने भी गुरु रविदास जी की वाणी को गुरु ग्रँथ में से, ये कह कर निकाल दी थी, कि हम चमार चूहड़ों की वाणी गुरुग्रन्थ साहिब में नहीं डालेंगे, जिसके कारण, उनकी संपादित संपूर्ण वाणी ही ग्रँथ साहिब से लुप्त जो गई थी, जिससे आहत होकर, सभी सिख सन्तों और गुरूओं ने गंभीरता से चिन्तन किया और अनुभव किया किया ये सर्वस्व, भाई गुरदास की ही करतूत है जिसने गुरूओं के गुरु रविदास जी की वाणी को ग्रँथ साहिब से बाहर करके, गुरु रविदास जी का अपमान किया है मगर सियाने सिख के सुझाब के अनुसार, ग्रँथ को सफेद कपड़े में लपेटकर, अरदास की, कि हे गुरूओं के गुरु रविदास जी महाराज, हम निमाणो से बड़ा अपराध हो गया है, हम सभी दण्डवत होकर क्षमा मांगते हैं, और बड़े सम्मान सहित आप की वाणी गुरु ग्रँथ साहिब में दर्ज करके आपको सम्मानित करते हैं, कृपा की बख्शिश का दान करते हुए, ग्रँथ को पुनः संपूर्ण करो। कहते हैं कि अरदास करके ग्रँथ को रख दिया गया, जब सुवह पुनः देखा तो ग्रँथ जैसे पहले वाणी से भरपूर था, वैसा ही गुरु रविदास जी की निष्कासित वाणी से युक्त था। सभी ने पुनः अरदास करके, अपनी भूल को बख्शाया और ग्रँथ साहिब में 22 शव्दों को सम्मानजनक स्थान दिया गया। ऐसा भेदभाव तो सिखों ने भी किया था, फिर ब्राह्मणों ने तो, गुरु जी को सुख की सांस तक, नहीं लेने दी थी। गुरु नानकदेवजी जी के पास यही चालीस शव्द सुरक्षित रहे, जो गुरु रविदास जी भाषा शैली से मेल खाते हैं बाकी वाणी जो संकलित ही, की गई है, वह गुरु रविदास जी मौलिक वाणी से मेल नहीं खाती।
गुरु रविदास जी भक्तिकाल के सन्तों के प्रमुख, सन्त शिरोमणि ही नहीं, निर्विवादित सन्त शिरोमणि सिरमौर हुए हैं। जिन्हें ये मान्यताएं इसीलिए मिली कि उन्होंने सभी गुरूओं से बढ़कर काम किया, उच्च स्तरीय वाणी लिखी, उच्चारी, सत्संग किये, प्रवचन किए, संसार में मॉन सम्मान हासिल किया, अत्याचारियों को नत्थ डाली, क्रांतिकारी परिवर्तन किए, धार्मिक क्रान्ति से पाखण्डवाद का ब्राह्मणी किला नेशतनाबूद किया, आडंबरों को ध्वस्त करके सहज साधना की ओर, संगत को निर्गुण भक्ति साधना की ओर उन्मुख किया। धोती तिलक और शंख बजाने के आडंबरों का मजाक उड़ाकर ब्राह्मणों को भी इनसे छुटकारा पाने का आह्वान किया।
गुरु रविदास जी से तत्कालीन, प्रकांड ब्राह्मण रामानंद, परमानंद बुरी तरह मुंह की खा चुके थे, गन्दे जूतों को जिस पत्थर की गन्दी शिला के ऊपर सन्त रैदास और सन्त जीवनदास जी जूतों की मुरम्मत किया करते, उसी शिला को गंगा नदी में फेंका और उसी को तैराकर ब्राह्मणों के खोखले ज्ञान के अहंकार का किला ध्वस्त करके जनता का मन मोहा था और राजा नागरमल के कड़े आदेश पर, ब्राह्मणों ने गुरु रविदास जी को पालकी में सवार करके सारे कांशी नगर में शोभायात्रा के साथ घुमाया था, जिससे ब्राह्मणों के प्रधान भी गुरु रविदास जी को दण्डवत शीश निवाते हुए अभिवादन करते थे:-----
नागर जनां मेरी जात विखिआत चमारँ।
हिरदै राम गोविंद गन सारँ।।१।।रहाउ।।
सुरसरी सलल किरत बारुनी रे।
सन्त जन करत नहीं पानँ।।
सुरा अपवित्र नत अवर जल रे।
सुरसरी मिलत नहीं होई आनं ।।१।।
तर तारी अपवित्र कर मानिए रे।
जैसे कागरा करत विचारं।।
भगति भगताऊत लिखिए तिह ऊपरे।
पूजीए करी नमस्कारं।।२।।
मेरी जाति कुटबॉण्डला ढोर ढोबन्ता।
नितिह बनारसी आस पासा।।
अब विप्र प्रधान तिहि करहि डंडाउति।
तेरे नाम शरणाई रविदासु दासा।।३।।
कबीर साहिब गुरु रविदास जी से 22 वर्ष छोटे थे, जिनका पालन पोषण, मुसलमान परिवार में हुआ था, उस समय मुस्लिम बादशाहों का वरदहस्त और झुकाव भी कबीर साहिब की तरफ रहा होगा, जिसके कारण उनकी वाणी को ब्राह्मणों ने क्षतिग्रस्त नहीं किया, वे गुरु रविदास जी की तरह आजीवन सामाजिक क्रांति की मिशाल लेकर दिनरात, देश विदेश में घूमे भी नहीं मगर उनकी अथाह वाणी मिलती है, स्कूली पाठयक्रमों में भी पढ़ाई गई, संग्रहीत भी की गई मगर गुरु रविदास जी की वाणी के, जो शव्द सिखों के गुरुद्वारों में सुरक्षित रही, वहीं मौलिक रूप से मिलती है, जिसके क्या कारण हो सकते हैं, सहज ही समझे जा सकते।
सेन जी तो राजदरबारी ठाकुर थे, वे राजमहल में राजपरिवार की ही सेवा करके अपना जीवन निर्वाह किया करते थे, उनसे तो घुमक्कड़ी की उमीद ही नहीं की जा सकती। उनकी वाणी भी कितनी होगी, उसका भी सहज ही अनुमान लगाया जा सकता।
गुरु नानकदेवजी की तो अभी पारी शुरू ही हुई थी, फिर वे जीवित भी 70 वर्ष तक ही रहे, इस पीरियड में उन्होंने कितना साहित्य रचा होगा उस का भी अनुमान लगाया जा सकता है।
अब अगर हम गुरु रविदास जी के संघर्षों का आकलन करते हैं। गुरु रविदास जी ने जन्म लेते ही, छूने मात्र से ही, अंधी दाई भानी को नेत्रदान कर दिया था। जन्म से ही ब्राह्मणों के आडंबरों का पर्दाफाश करना शुरू कर दिया था, ब्राह्मण भेष धारण कर ब्राह्मणों का उपहास उड़ाना, उस समय किसी राजा की भी औकात नहीं थी मगर बालक रविदास ने ये दिव्य चमत्कार करके ब्राह्मणवाद की चूलें हिला कर रख दीं थीं। पराजित होते ब्राह्मण और इंजेक्शन राजाओँ, बादशाहों को लगता था जिससे वे भी कांप उठते और गुरु रविदास जी के समक्ष नतमस्तक हो जाते, गुरु जी की दिव्य शक्तियों से प्रभावित होकर बाबन राजे, महाराजे और बादशाह उनके शिष्य बनते गए, जिनमे से राजा नागरमल, बैन, पीपा, कुंभसिंह, रॉयमल, राणा सांगा, रतनसिंह, भोजराज, बिकमादित्य, दूदाराव उनका राजकुमार रतनसिंह, पोती मीराबाई, रानी झालाबाई, कर्माबाई आदि उनके सत्संग सुना करते थे, उनके आमंत्रण पर उनके महलों में भी जाकर हजारों जिज्ञासुओं को भी प्रवचन सुनाया करते थे, गुरु रविदास जी समय और परिस्थियों के अनुसार, तत्काल शव्द रचना करके सुनाया करते थे। हजारों सत्संगों में हजारों शव्दों की रचना करते हुए गाए गए मगर उनमें से हजारों तो क्या सैंकड़ों भी आज उपलब्ध नहीं, क्या कारण है ?
गुरु जी 151 वर्षों में ना जाने कितने सन्त सम्मेलनों में, तत्कालीन समस्याओं, तत्कालीन भयावह परिस्थितियों को ध्यान में रखकर शव्द निर्माण करके संगत को सुनाते रहे, वे रचनाऐं कहाँ चली गईं ? तर्कपूर्ण विचारणीय विषय है।
जहां जहां गुरु रविदास जी रुकते वहीं स्थानीय वातावरण, भाषा यहाँ तक सिकन्दर लोधी के समक्ष फारसी में ही शव्द रचना करके उसके अहंकार को तोड़ा, क्षेत्रीय बोलियों में और नाजुक हालातों के अनुसार शव्द रचना करके संगत को, क्षेत्रीय बोलियों में समझाकर, सत्संग और व्याख्या किया करते थे, वे शव्द भी आज कहीं भी उपलब्ध नहीं है।
151 साल की आयु में अगर प्रति वर्ष दस दस शव्दों की भी रचना की हो तब भी 1510 शव्द बनते हैं, दस दस दोहे ही रचे हों तब भी 1510 दोहों का दोहासागर होना चाहिए था मगर आज कुछ नाममात्र को ही मिलते हैं।I
गुरु रविदास जी ने मर्यादित भाषाओं में मर्यादित साहित्य लिखा हुआ है, एक भी शव्द सांसारिक इश्क़ मुश्क में पढ़ने को नहीं मिलता, किसी भी शव्द या दोहे में तुलसीदास, सूरदास की तरह, राम, कृष्ण, राधा, गोप, ग्वालों और गोपियों के माध्यम से, इश्क की बू कहीं नहीं मिलती। जहाँ गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि, मत पूजिए विप्र जदपि गुनहीना, वहीं तुलसीदास अपनी अलौकिकता का जलूस निकालते हुए लिखते हैं कि, मत पूजिए चरण चंडाल के जदपि गुन प्रवीणा। सूरदास ने ने नायिका राधा के इश्क प्यार की नाजुक बुलंदियों की कोई सीमा ही नहीं छोड़ीं है, कृष्ण की भद्दी लीलाओं का चित्रण करके भगबान के अस्तित्व को ही ग्रहण लगाया हुआ है। रीतिकालीन कवियों ने तो कृष्ण के बहाने अपने मन की भड़ास बुरी तरह, नारी को खिलौना बनाकर व्यक्त की हुई है, केशव, बिहारी ने तो नारी के अंग प्रत्यंग की एक एक नजाकत, हरकत यहां तक भरे भवन में नायिका घूंघट में ही नयनों से बातें करती हुई दर्शाई हुई है, इन श्रृंगार के पुजारियों का बांगमय, साहित्य पूर्णरूपेण सुरक्षित मिलता है मगर गुरु रविदास जी का साहित्य कहाँ छुप गया, रिसर्च का विषय है। गुरु रविदास जी के नाम पर यश कमाने वाले मूलनिवासी साहित्यकार, सत्य और असत्य, छलकपट और बेईमानी को परख कर ही गुरु रविदास जी के रिसर्च थिसिज लिखें, नई रचनाएं लिखें अन्यथा गुरु रविदास जी माफ नहीं करेंगे।
।।सोहम।जय गुरुदेव।।
रामसिंह शुक्ला।
अध्यक्ष।
विश्व आदिधर्म मंडल।

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