।।गुरु रविदास जी की पोथीसाहिब लुप्त क्यों की।।

गुर रविदास जी की अथाह वाणी थी, वह कहाँ चली गई, जिसके बारे में इतिहास चुप है। केवल ब्राह्मण लेखक हजारी प्रसाद द्विवेदी ने, कुछ काम करके गुरु रविदास जी के बारे में, मात्र जानकारी उपलब्ध करवाई है, बाकी मूलनिवासी लेखक तो स्वतंत्रता के बाद, मुखर होने लगे थे, जिन्होंने भी, केवल गुरु रविदास जी के ब्राह्मणीकरण की ही हूबहू नकल करके, चर्मकार के रूप में ही चित्रित कर दिया। चमार कवियों ने भी चर्मकार के रुप में ही काव्य रचना करके, जूते गंडने वाले गीत लिखकर, दिमाग के अंधे गायकों ने भी, रविदास जुतियाँ गंडे ही गीत गाए। गुरु जी के इतने करिश्में हैं, कि जिनपर इन लोगों की ना तो नजर ही गई और ना ही बुद्धि दौड़ाई। ब्राह्मणवाद ने, गुरु रविदास जी को घृणित रूप में लिख कर, समाज मे दर्शाया था, अछूत लोगों के दिलों में भी वैसी ही धारण भर कर, उनसे भी, वही काम ले लिया, जो ये ब्राह्मण करते रहे। कभी अछूत लेखकों ने, ये तनिक नहीं सोचा कि, क्या जो लिखा गया है, वह तर्कसंगत है भी या नहीं। ब्राह्मणों ने कभी भी सत्य के आधार पर नहीं लिखा औऱ ना ही अछूतों को भी लिखने दिया, जो सत्य था उसे भी अछूतों की गुलाम लेखनी से मिटा दिया।
गुरु रविदास जी के साहित्य को किस किस ने, किन परिस्थितियों में क्यों मिटाया, आज मेरा यही लक्ष्य है। गुरु जी ने मूलनिवासियों के ऊपर पाँच हजार सालों से चली आ रही, गुलामी की जंजीरों को तोड़ने के लिए जो क्रान्ति का हथौड़ा चलाया, उससे भारत के ब्राह्मण, जाट बौखला गए, जिसके लिए इन्होंने तत्कालीन राजपूतों, राजाओँ, महाराजाओं, मुस्लिम बादशाहों को गुमराह करके, शूद्रों को टारगेट करते रहे।
ब्राह्मणों ने छद्मनीति से वाणी लुप्त की:---- गुरु रविदास जी ने, किसी के मॉन-सम्मान, अहं को कभी कोई ठेस नहीं पहुचाई, बल्कि सभी जातियों के दुखियों और गरीबों की लड़ाई लड़ी, अत्याचारियों, बलात्कारियों, अडंबरवादियों, ठगों, लुटेरों के खिलाफ ही जंग की शुरुआत की थी। इन समस्याओं से सभी मनुबादी अमीर गरीब भी संतप्त थे, किसी को भी न्याय नहीं मिलता था, कानून का कोई शासन था ही नहीं। ब्राह्मण, मुल्ला औऱ पादरी प्रजा को तर्कहीन कथाओं को सुनाकर मजे लूट रहे थे। मौलवी मस्जिदों में बैठ कर जोर जोर से बांगें मारते फिरते, जिनके बारे में कबीर साहिब भी क्रांतिकारी वाणी में फरमाते हैं:------
कंकर पत्थर जोड़ी के मंदिर मस्जिद लए बनाए।
तां चढ़ बांग दे मुल्ला, क्या बहरा हुआ खुदाए।।
कबीर जी ने भी वहुत ही बड़े हथोड़े से चोट करते हुए इस्लाम के आडंबरों को बेनकाब किया और फरमाते हैं कि, क्या खुदा, जो सब को कान देता है, वह बहरा है कि, जिसे सुनाने केलिये, तुम बांगें मारे जाते हो। गुरु रविदास जी ने भी मुस्लिमों की पोल खोल कर काजियों की नींद हराम कर दी थी:-----
रविदास जो पोषण हेत गऊ बकरी नित खाय।
पढ़ई नमाज़ें रातदिन कबहूँ भिस्त ना जाय।।
काजियों और मौलवियों की भी पोल खोल कर गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि, अपने भरण पोषण केलिये, तुम हररोज बकरी और गाय को काट कर खाते हो, हे ! भाई तुम दिनरात नमाजें पढ़ते हो, तुम्हें स्वर्ग कभी नहीं मिलेगा, गुरु जी पुनः काजियों की मूर्खता पर कटाक्ष करते हुए जोरदार प्रहार करते हैं:-----
रविदास मूँड़ काटिकर मूर्ख कहत हलाल।
गला कटावहु अपना तउ का होईहि हाल।।
गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि, धीरे धीरे गला रेत कर, काटकर मुस्लिम कहते हैं कि, हमने हलाल किया है मगर, अगर तुम इसी तरह कभी अपना गला कटाओगे, तब पता चलेगा कि क्या हालत होती है।
गुरु रविदास जी के मुस्लिम शिष्य:----गुरु जी के असंख्य मुसलमान भी शिष्य बन गए थे, जिनमें सदना कसाई मुख्य था, जिसके कारण काजियों को भी गुरु रविदास जी से खुंदक हो गई थी। उधर बादशाह सिकन्दर लोधी भी, गुरु जी की शक्ति के आगे हाथ खड़े कर गया और शिष्य बन गया, जिससे काजी अत्यंत परेशान हो गए और पठानों से मिलीभगत करके, गुरुजी को मरवाने केलिये, उन्हें उकसाने लगे। इन काजियों ने फ़ौज में भी अपना वायरस फैला दिया ताकि वे भी धर्मान्ध होकर गुरु जी को रास्ते से हटा सकें, मगर मुस्लिम सेना भी कुछ नहीं कर सकी, कोई भी गुरु जी का बाल बांका नहीं कर सका। हार कर काजियों ने दिल्ली के बादशाह सुलतान अहलावादी के पास दुर्खासत लिखकर दी, जिसके बारे में बाबा हरिदास जी ने लिखा है:-----
"घर घर रविदास भगत की महिमा"
जब संसार महिं वहुत पसरी तब काजियाँ सुलतान अलाहवादी पहि, बात चलाई कि जेह रविदास चमियार अरु खलक हिन्दू मुस्लमान इस पास वहुत रजु होते हैं अरु आपि कऊ पीर कहावदा है, घर लोकां कऊ मुरीद करता है। पर जी तुम उस कऊ बुलाई कर, पुछहु जी इहु ते किया कुफर चालाया है,तब सुलतान अलाहवादी रविदास केऊ बुलाया।
इससे ज्ञात होता है कि, मुसलमान भी अपने इस्लाम की घटती शाख को देखकर परेशान हो चुके थे। जब गुरु रविदास जी का कोई भी कुछ भी नहीं बिगाड़ सके तो, काजियों, मुल्लों ने मिलकर गुरु जी के साहित्य को ही बर्बाद करने केलिये, मुसलमान फ़ौज का सहारा लिया और सारी वाणी नष्ट कर दी।
ब्राह्मणों ने आतंक मचाकर वाणी जलाई:----गुरु जी ने शान्ति के मार्ग पर चलते हुए, अकेले ही धार्मिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक औऱ सामाजिक क्रांति को, बिना फ़ौज फाहणी के ही चलाया हुआ था। गुरु जी ने अपनी क्रांतिकारी वाणी से, मॉनवता विरोधी, ब्राह्मणों की पुस्तकों का बुरी तरह से खंडन करके ब्राह्मणों की छुआछूत, मनुस्मृति के काले कानूनों के प्रति विद्रोह की ज्वाला जला कर, मूलनिवासियों को जागृत करने का अभियान जारी रखा हुआ था। सन 1194 ईस्वी में जब शहाबुद्दीन गौरी ने फिरोजाबाद के पास युद्ध में, जयचंद को कत्ल कर के बनारस और सारनाथ की बुरी तरह तवाही कर दी, बड़ी बड़ी इमारतों को गिरा दिया, अहिंसावादी बौद्ध भिक्षुओं का नरसंहार कर दिया तो उन्हें जान के लाले पड़ गए और वहां से भाग खड़े हुए, कुछ मुसलमान फ़ौज के हाथों मार दिए गए, जिससे सारा सारनाथ धीरे धीरे वियावान जंगल बनता गया, यहाँ तक कि बौद्ध लोग अपना अस्तित्व भी भूल गए, इसी उथल पुथल का लाभ लेते हुए, ब्राह्मणों ने बनारस के घर घर की तलासी लेकर, गुरु रविदास जी का सारा साहित्य आग की भेंट चढ़ा दिया।
जाटों, ब्राह्मणों का घोलमेल:---ब्राह्मणों, जाटों, काजियाँ की कूटनीति को मुस्लिम बादशाह,
समझ ही नहीं सके, अगर जानते भी होंगे, तब भी वे कूटनीतिज्ञ ब्राह्मणों से पंगा ना लेकर, भारत की लूटघसूट में उनका सहयोग लेने में ही, अपनी अक्लबन्दी समझते थे। जबकि राजपूत राजे, ब्राह्मणों के चरित्र को अच्छी तरह से पहचानते थे, इसीलिए राजपूत शासकों ने गुरु रविदास जी को कभी अपमानित नहीं किया, मगर ब्राह्मणों और जाटों को भी नाराज नहीं किया, जिससे इन लोगों को रानीतिक शरण और शक्ति मिलती रही। ये दोनों मूलनिवासियों के ऊपर मिल कर अत्याचार करते हुए, गुरु जी की सवर्ण विरोधी वाणी को नष्ट करते रहे, जिसका राजपूत और मुस्लिम शासकों ने कभी भी संज्ञान लेकर, गुरु रविदास जी की वाणी को बचाने का प्रयास नहीं किया, जिससे गुरु जी वाणी लुप्त होती ही गई।
।।सोहम।। जय गुरुदेव।।
रामसिंह शुक्ला।
अध्यक्ष।
विश्व आदिधर्म मंडल।

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