।।गुरु रविदास और विश्व ग्रँथ पोथीसाहिब की प्रमाणिकता।।

गुरु रविदास जी महाराज, विश्व में ऐसे रणबांकुरे हुए जिनका कोई सानी ना हुआ और ना ही होगा। योद्धा तो युद्ध केवल कभी कू बार युद्ध लगने पर ही, किसी एक सीमा पर, दुश्मनों से लड़ाई लड़ता है मगर गुरु रविदास जी ऐसे योद्धा हुए, जिन्होंने हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई, पारसी आदि धर्मो के पंडितों, राजाओँ और बादशाहों के साथ, धर्मयुद्ध लड़े, जिसमें छली, कपटी, धोखेबाज, निर्मोही, अत्याचारी, दुश्मन बार बार आक्रमण किया करते थे, वे मुंह की खाने के बाद भी बाज नहीं आते थे। सत्य और साक्षात तर्क संगत प्रमाण देखकर भी, पीछा नहीं छोड़ते थे, ये दुश्मन इतने जाहिल थे, कि गुरु रविदास जी को मौत के घाट उतारने पर उतारू हो जाते थे, जब ये लोग अकेले सत्पुरुष गुरु रविदास जी से बुरी तरह पराजित हो भी जाते, तब भी पीछा नहीं छोड़ते थे, जब खुद वीर योद्धा को मार नहीं सके तो, राजाओँ, महाराजाओं, बादशाहों को झूठे, मनघण्ड़त, दुर्खास्तों पर आरोप लिखकर, सजा ऐ मौत दिलाने केलिये, उनके पास पर्चे दिया करते, जब वहां भी नानी याद जाती, तो मुंह छुपाकर भाग भी जाते। गुरु जी ने हमेशा ऐसे भटके हुए लोगों को अक्ल देकर, सन्मार्ग पर ही लाने का प्रयास किया, मगर ये लोग ना तब सुधरे, ना ही अब सुधर रहे।
गुरु जी 151 साल की आयु में समाधिस्थ हुए, ऐसा होते ही, उनका नामोनिशान मिटाना शुरू कर दिया गया। सिखों के घरों में घुसने की हिमाकत नहीं कर सके, जिसके कारण, गुरु जी के चालीस शव्द बचे रहे मगर बाकी साहित्य आज तक खोजी, खोज नहीं सके। सन्तों के साथ धर्म चर्चा करते हुए गुरु रविदास जी फरमाते हैं:------
हर सों हीरा छांड़ि के करै आन की आस।
ते नर दोजक जाएंगे सत भाखै रविदास।।
साधु संतों को संबोधित करते हुए, उनकी दोगली नीति के देखकर कहा:-----
साधौ ! का शास्त्रण सुनी कीन्हों।
अनपावनी भगति नहीं साधी,
भूखे अन्न ना दीनौं।।टेक।।
काम ना विसरयौ दंभ ना त्यागयो,
लोभ ना विसारियो देवा।
पर निंदा मुख तें नहीं छांड़ि,
निहफल भयी सभु सेवा।।१।
बाट पड़ी घर घुसि परायो,
उदरी भरियो अपराधी।
होवै अपराधी कैसो ना सिमरियो,
हंऊं अस अविद्या साधी।।२।।
हरि अरपन करी भोजन कीनो,
कथा कीर्तन नहीं जानी।
राम भगति बिन मुक्ति ना पावै,
अमर जीव गरावै प्राणी।।३।।
चरण कंवल अनराग ना उपज्यो,
भूत दया ही मन माहिं पाली,
रविदास पलु साध संगति मिली,
पूरन ब्रह्म सदा प्रतिपाली।।४।।
जब राजा नागमल के पास ब्राह्मणों ने झूठी शिकायतों से भरा हुआ, आरोप पत्र देकर गुरु रविदास जी को जेल में डालने का षड़यंत्र किया और राजा नागरमल के सामने बुरी तरह हार भी गए, तब फिर गुरु जी ने, अपने मधुर राग मल्हार में कहा:-----
नागर जनां मेरी जात विखयात चमारँ।।
हिरदै राम गोविंद गन सारँ।। रहाउ।।१।।
सुरसरी सलल करित बारुनी रे।
सन्त जन करत नहीं पानं।।
सुरा अपवित्र नत अवर जल रे।।
सुरसरी मिलत नहीं होई आनँ।।१।।
तर तारी अपवित्र कर मानिए रे,
जैसे कागरा करत बिचारँ।।
भगति भगताउतु लिखिए तिहि ऊपरे,
पूजिए करी नमस्कारं।।२।।
मेरी जात कुटबॉण्डला ढोर धोबन्ता,
नितहि बनारसी आस पासा।।
अब विप्र प्रधान तिहि करहि डंडोंउति,
तेरे नाम शरणाई रविदास दासा।।३।।
आडंबरों को देखकर, पण्डों को धिक्कारते और फटकारते हुए गुरु रविदास जी फरमाते हैं:-----
पांडे ! हरि बिच अंतर डाढा।।
मुंड मुंडावे सेवा पूजा भरम का बंधन गाढ़ा।।टेक।।
माला तिलक मनोहर वाणों, लागो जम की पासी।।
जो हरि सेती जोड़ियो चाहो, तो जग सो रहो उदासी।।१।।
भुख ना भाजे त्रिषणा ना जाई, कहो कौन कबन गुण होई।।
जो दधि में कांजी को जावण, तो घृत ना काढे कोई।।२।।
करनी कथनी ज्ञान अधारा, भगति इन्हों से नियारी।।
दोय घोड़ा चढ़ी कोउ ना पहुँचो, सतिगुरु कहे पुकारी।।३।।
जो दास तन साफ कियो चाहो, आस भगति की होई।।
तो निरमल सांग मगन हवै, नाचो लाज शर्म सब खोई।।४।।
कोई दाधौ कोई सूधो, सांचो कूड़ निति मारया।।
कहे रविदास हौऊं ना कहत, युगों युग से सति पुकारिया।।५।।
गुरु रविदास जी ब्राह्मणों के साथ गोष्ठी करते हुए, कड़े और तीखे प्रहार करते हुए फरमाते हैं:---
पांडे कैसी पूजि रची रे।
सति बोले सोय सतिवादी, झूठी बात बदी रे।।टेक।।
जो अविनासी सबका करता, व्यापि रहिओ सब ठौर रे।
पंच तत जिन्हीं किया पसारा, सो यों ही किछु और रे।।१।।
तूँ जो कहत हो होंउँ ही करता, या कूँ मूरति सभै करै रे।।
तारिणी शक्ति सही जे या,मैं तौ आपण क्यों ना तिरे रे।।२।।
अहं भरोसा जब जग बूढ़ा, सुण पंडत तूँ मम बात रे।।
या के दरसी कूंन गुणा छूटा, दब जग आया जात रे।।
या की सेव सूल नहिं भागे, कटे ना संसे तन फास रे।।
सोची विचारि देख या मूर्ति, यों छाँड़ि रविदास रे।।
गुरु रविदास जी, अपनी वाणी में फरमाते हैं कि, "मैं राम नाम धन लादिया, विष लादी संसार"।इससे ज्ञात होता है कि,वे ब्रह्म रूप हो गए थे, जिससे, उन्हें जो ब्रह्म ज्ञान, हासिल हो गया था, उसका व्याख्यान भी, सत्संगों में किया है, ज्ञान का भंडार कहाँ चला गया, चिंतन का विषय है।उन्होंने, सभी गुरूओं के साथ विश्व धर्म और आदिधर्म, पर गहन चिंतन किया था। जिसके प्रचार प्रसार केलिये, योजना वद्ध तरीके से काम किया गया, उसके बारे में, रंचमात्र कहीं कहीं प्रसंग के रूप में, वर्णन ही मिलता है मगर उनकी संपूर्ण वाणी नहीं मिलती।
।। सोहम।।जय गुरुदेव।।
रामसिंह शुक्ला।
अध्यक्ष।
विश्व आदिधर्म मंडल।

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