।।गुरु रविदास जी और हिन्दू-मुस्लिम एकता।
गुरु रविदास जी महाराज ने हमेशा मॉनवतावादी दृष्टिकोण अपना कर, सारे संसार को सतसन्देश और उपदेश देकर, केवल मॉनव जाति में फैलाए गए भेदभाव और घृणा को समाप्त करने की कोशिश की है, जिसके सकारात्मक परिणाम भी निकले हैं, क्योंकि जो आज सामाजिक परिवर्तन आया है, वह केवल गुरु रविदास जी महाराज की ही क्रांति के कारण संभव हुआ है। पाँच हजार वर्षों तक जो नारकीय जीवन हमारे पूर्वजों ने बिताया था, उसे सुन कर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। आज भी वैसी घटनाएं घट रहीं हैं मगर वे शासन की कमजोरी है। गुरु रविदास जी ने शासकों को ही नकेल डाली थी, किसी भी जाति के अत्याचारी को खुद अपने हाथों से कभी भी किसी को दण्ड नहीं दिया था, वे दण्ड मानसिक दण्ड ही दिया करते थे, कई बार पापी को ही पापी से सजा ए मौत दलाई थी। अधिकतर उन्होंने शान्ति से ही क्रान्ति की चिंगारियां पैदा की और चारों ओर अपना संदेश पहुँचा दिया था। भारत में शासन केवल मुसलमान औऱ हिंदुओं के पास था। दोनों ही जनता के खून को चूस कर, जनता को बड़ी बेरहमी से निचोड़े जा रहे थे। आपस में लड़-भिड़ कर, खून भी जनता का ही वहाकर इंसानियत को शर्मसार कर रहे थे, इसीलिए उन्होंने, हिन्दू-मुस्लिम भाईचारे को प्रमोट किया और कहा:---
मुसलमान सिओं दोस्ती, हिंदुअन सिओं कर प्रीत।
रविदास जोति सभ प्रभ की, सभ हैं अपने ही मीत।।
गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि, हे भारत में रहने वालों, अगर आप सुखी जीवन जीना चाहते हो तो मुसलमानों के साथ मित्रता करो, हिंदुओं के साथ प्यार, स्नेह और श्रद्धा रखो। अगर हिन्दू मसलमानों को मित्र समझेंगे, मुसलमान हिंदुओं के साथ प्रेम से रहेंगे, तभी सुख और शान्ति बनी रहेगी अन्यथा, हररोज आपस में घमासान युद्ध, खून-खराबा और अशांति ही रहेगी। गुरु रविदास जी दोनों धर्मों को एक मंच पर लाने का प्रयास करते हुए कहते हैं कि, हिंदुओं और मुसलमानों की आत्मा में निरंकार आदिपुरुष की ज्योति जगमग करती है, जिस नूर से दोनों संसारिकता का आनंद उठाते आए हैं, फिर सभी आपस में दोस्त हैं। गुरु रविदास जी ने हमेशा तर्कसंगत बात कही, तर्कसंगत सन्देश दिया। गुरु जी आगे फिर तर्कसम्मत भाषा में समझाते हैं:---
अब्बल अल्ला नूर उपाया, कुदरत दे सब बन्दे।
इक नूर ते जग उपजिया, कउन भले कउन मंदे।
गुरु रविदास जी महाराज, हिंदू मुसलमानों को एकरस, समरस होने के लिए फरमाते हैं कि, अल्ला का प्रकाश वहुत ही श्रेष्ठ और सुंदर है, उसके नियम भी अति तर्कसंगत हैं, सभी मानस जाति उसी प्रकृति की देंन है, उसी के आदमी हैं। जब सभी एक ही नूर से, एक ही अदृश्य शक्ति से, सभी का आविर्भाव हुआ है, फिर कोई कैसे भला और बुरा हो सकता है ?
गुरु रविदास जी के इतिहास को, खरोल कर देखा जा सकता है, कहीं भी रिफ्ट वाला कोई भी उपदेश नहीं मिलता है। कहीं भी किसी से भेदभाव करने की बू नजर नहीं आती, कहीं भी किसी को ऊंचा नीच सिद्ध करने वाला कमेंट नहीं मिलता है। गुरु रविदास जी महाराज एक सशक्त समन्यवादी अवतार हुए है, वहुमुखी प्रतिभा के भंडार हुए हैं। जरा सभी पैग़ंबरों के जीवन चरित्रों, उनके रहन-सहनों पर दृष्टिपात किया जाए तो, गुरु जी की तुलना किसी से नहीं कि जा सकती और जो लोग, गुरु जी की तुलना किसी से करते हैं, उनकी सोच पर तरस आता है, उनके चिंतन पर सवाल खड़े होते कि, क्या ये लोग अपनी तर्क शक्ति नहीं रखते हैं ? क्या महापुरुषों की किसी के साथ तुलना व्यवहारिक है ? क्या उन सभी का कद हम नीचा नहीं करते हैं ? मैं समझता हूँ कि, हमें तुलना की अपेक्षा उनके कार्यो की समीक्षा करके, जो लाभदायक लगे उसका ही अनुशरण करना चाहिए।
।।सोहम।।जय गुरुदेव।।
रामसिंह शुक्ला।
अध्यक्ष।
विश्व आदिधर्म मंडल।
जुलाई21, 2020।
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