गुरु रविदास जी का पोथीसाहिब कहाँ चला गया।

।।गुरु रविदास और मूलनिवासी साहित्यिक क्रान्ति।।
।। भाग छः।।
गुरु रविदास जी महाराज के, लुप्त साहित्य पर रिसर्च करने वाले, डाक्टर महीपसिंह (आदिग्रन्थ में संगृहीत सन्त कवि पृष्ठ-57) के अनुसार गुरु अर्जुनदेव ने अपने एक पद में अपने पूर्व के अनेक सन्तों का उल्लेख किया है। इस उल्लेख में सन्त वेणी का नाम भी है। इससे ये बात स्पष्ट होती है कि, धन्ना, कबीर, सैन, जयदेव, त्रिलोचन नामदेव, गुरु रविदास जी के समान ही वेणी का नाम भी लोक जीवन में चर्चित और स्वीकृत नाम था:------
धन्ने सेविया वाल बुद्धि। त्रिलोचन गुर मिली भई सिधि।।
वेणी कउ गुरि किउ परगासु। रे मन तूँ भी होहि दासु।।
जैदेव तियागिउ अहंमेव, नाई उधरिउ सैन सेव।।
मनु डिगी ने डोलै कहूँ जाइ, मन तूँ भी तरसिंह सरणि पाई।।
जिह अनुग्रहउ ठाकुरी किउ आपि, से तें लीन्हे भगत राखि।।
तिन का गुणि अवगुणु ना बिचारिउ कोई, इह बिधि देखी मनु लगा सेव।।
कबीर धआयउ एक रंग, नामदेव हरि जिउ बसहिं संगी।।
रविदास धिआइए प्रभु अनूप, गुरु नानकदेव गोविंद रूप।।
सगुण उपासक सूरदास ने भी गुरु रविदास जी का सानिध्य पाया था, जिसका विवरण, उनके महाकाव्य "सूरसागर" में दर्ज है। श्री सन्तमाल के पृष्ठ-259 पर सूरदास जी ने गुरु रविदास जी का जिक्र इस तरह किया हुआ है:-----
रविदास मोहि इक दमरी दीनी।
करि सरधा भेटा गंगा कउ दीनी।
सो गंगा ने बांह पसार लीनी।
दमरी लीनी बीच हरिदुआर।
तिहि कर ते इह कंगन गिरिउ।
मैं पाई इनाम लै सिर परि धरिउ।
कंगन दूजा पाइआ।
राजा रहिआ निहार।
इह बात सभन सुन पाई।
रविदासु इह सभ जग पूजे आई।
सधना रैदास मीराबाई, कृपा करी रविराज।
"जसवीर जस्सी सतगुरु रविदास जी पृष्ठ-447"
जब छुआछूत चरमसीमा पर थी, उसी समय गुरु रविदास जी हुए, जिन्होंने अकेले ब्राह्मणवाद के साथ धर्मयुद्ध, जाति युद्ध, लड़ा। अकेले चले थे रास्ते में कारवाँ बनता गया, कबीर जी नामदेव, सधना, सेन, धन्ना, मन्ना, रंकाबंका, नानकदेव, त्रिलोचन, सन्तों के साथ मीराबाई, कर्माबाई, कमाली, सन्तकौर, भी कारबां में शामिल होती गईं। जिनमें राजपूत वीरांगना मीराबाई ने सती होकर जौहर नहीं दिखाया मगर, गुरु रविदास जी के कंधे से कंधा मिलाकर जौहर के नाम पर जिंदा बेकसूर नारियों को जलाने वालों को ही जलाना शुरू किया था जिससे जिंदा स्त्रियों को चीख चीख कर, चिल्ला-चिल्ला कर जलने से बचाने केलिये, मीराबाई ने गुरु रविदास जी का साथ दिया था, जिस विशेष गुण को किसी ने भी उजागर किया, वस मीरां के गिरधर नागर का जाप जपाया गया, ताकि मीरां का संबध चमार गुरु रविदास जी महाराज से खत्म होकर यादव कृष्ण से जोड़ा जाए। मीराबाई अपने सतगुरु रविदास जी के बारे में, डंके की चोट पर कहतीं हैं:-----
रविदास सन्त मिले मोहि सतगुरु,
दीन्हीं सुरति सहदानी।।
मैं मिली जाए पाय पिय अपना,
तब मोरी पीर बुझानी।।
मीरा सतगुरु देव की,
करे बन्दना ख़ास।
जिन चेतन आत्म कहिया,
धन भगवान रैदास (रविदास)।।
गुरु मिलिया रैदास (रविदास)जी,
दीन्हीं ज्ञान की गुटकी।
मीरां कू गोविंद मिलिया जी,
गुरु मिलियाजी रैदास (रविदास)।
डाक्टर कृष्ना रैना, अपने शोध पत्र "हिंदी निर्गुण सन्त काव्य, पृष्ठ-53"M A macauliff तथा डाक्टर सुदर्शन सिंह मजीठिया के हवाले से लिखतीं हैं, कि"गुरु नानकदेव जी के उपदेशों से तंग आकर इनके पिता ने, उन्हें व्यापार करने केलिये कहा और चुहड़काणा, जिला गुजरांवाला से नमक क्रय करने को कहा। नोकर को साथ लेकर नानकदेव नमक लाने केलिये चल पड़े। रास्ते में उनकी भेंट साधुओं से हुई जिनको, देख कर, इन्होंने सारा धन उन्हें वितरित कर दिया।
वास्तव में गुरु नानकदेवजी, जब अपने गाँव से चुहड़खाना की ओर गुजर रहे थे, तब उन्हें शब्द कीर्तन की ध्वनि सुनाई दी, जिसके बोल थे:-----
घट अबघट डूंगर घणा इक निरगुन बैल हमार।।
रमईए सिउ इक बेनती मेरी पूंजी राखु मुरार।।
को बनजारो रामु को मेरा टांडा लादिया जाई रे।
हउँ बनजारो राम को सहज करउ व्यापारू।
हउँ राम नाम धनु लादिया विखु लादी संसारू।
उरबार पार के दानिया लिखि लेहु आल पाताल।
मोहि जम डँड ना लागई तजीले सरब जंजाल।
जैसा रंग कसुंभ का तैसा इहु संसार।
मेरे रमइए रंग मजीठ का कह रविदास चमार।
गुरु नानकदेवजी, जब रास्ते से गुजर रहे थे तभी, उनके कान में जो संगीत लहरी गूंजी थी वह "है" 'को बनजारो राम को मेरा टांडा लादिया जाई रे।
हउँ बनजारो राम को सहज करउ व्यापारू। हउँ रामधनु लादिया विखु लादी संसारू" जिन्हें सुनकर वे तुरन्त मन में सोचने लगे कि, ये कैसा व्यापार है जिसका टांडा अर्थात रेहड़ा भरा जा रहा है ? ये राम नामक कैसा अच्छा धन है ? संसार के लोग कैसे बिख इकठ्ठा करके अपने टांडे में भर (लाद) रहे हैं ? ये बुझारत गुरु नानकदेवजी जी की समझ में कुछ आ भी रही थी, कुछ नहीं भी आ रही थी मगर यही सच्चा सौदा प्रतीत हो रहा है, जिसे करने से कोई हानि नहीं हो सकती। वे दोनों ही, जहां सत्संग हो रहा था, वहीं चले गए और चुपचाप किनारे बैठकर, गुरु रविदास जी के कीर्तन औऱ शव्द की व्याख्या सुनते रहे। सत्संग की समाप्ति के बाद, वे गुरु रविदास जी के पास गए और उन्हें नमन करके बैठ गए। उन्होंने गुरु रविदास जी से पूछा, महाराज, जिस व्यापार की आप बात कर रहे थे, वह मुझे वहुत अच्छा लगा कृपया आप मुझे भी विस्तार से समझाओ कि ये कैसा व्यापार है ? ताकि मैं भी, यही व्यापार कर सकूं। गुरु रविदास जी ने, उन्हें विस्तार से शव्द का अर्थ समझाया, जिसे सुन कर, नानकदेवजी जी के मन में भी भक्ति के अंकुर, अंकुरित होने वाले वैराग को और दृढ़ कर दिया, उसी समय गुरु दीक्षा लेकर, वे वहीं से वापस घर चले आए। घर आते ही जब उन्होंने, अपने सच्चे सौदेबाज़ी की बात पिता कालूदास को बताई तो वे क्रोधित हो गए और डांटते हुए कहने लगे, अब तूं नीच चमार को भी अपना गुरु बना बैठा, तब उन्होंने पिता जी को उतर देते हुए कहा:-----
नीचाँ अंदर नीच जात, नीची हूँ अति नीच।
नानक तिनके संग, साथ बड़ियां सिउ किया रीस।जिसे सुन कर, पिता कालू ने, उन्हें और खूब प्रताड़ित किया, जिससे दुखी हो कर, वे अपनी बहन नानकी के घर चले गए।
दक्षिण भारत के कवियों, समाज सुधारकों में सन्त वेमना का नाम सर्वोच्च है, जिनका जन्म सन 1406 ईस्वी में गाँव कोंडविड्डू, जिला मूगचिंतपल्ली, आंध्रप्रदेशमें हुआ था और 70 वर्ष की आयु में ब्रह्मलीन हो गए थे। वेमना जी किसी भी राजा का सम्मान नहीं करते थे, ना ही उनके चाटुकार राजकवियों का आदर करते थे।वे अति स्वाभिमानी सन्त थे। नार्ल वेंकटेश्वरराव, (वेमना, पृष्ठ-15) के अनुसार उच्च वरणियों को शूद्रों के प्रति बड़ी ही घृणा और नफरत थी, जब मद्रास सिविल सर्विस के चार्ल्स फिलिप ब्राउन ने 1829 ईस्वी में "वर्सेस आफ वेमना : मौरेल रिलीजस एंड सेटरिकल"-- --वेमना के नैतिक, धार्मिक और व्यंग्यात्मक पद्य नामक पुस्तक की 500 प्रतियों का पहला संस्करण प्रकाशित किया, तो 450 प्रतियां रहस्यपूर्ण ढंग से गायब कर दीं गईं और बाकी सभी प्रतियां संपादक को उपहार के रूप में दे दी गईं। दस वर्ष के बाद मिस्टर ब्राउन साहिब को इस बात का पता लगा, कि जिस कालेज, बोर्ड केलिये वे पुस्तकें उन्होंने प्रकाशित करबाईं थीं, उस बोर्ड के उच्चवर्णीय पंडितों ने बची हुई सभी प्रतियों को फाड़कर कालेज के पुस्तकालय के कबाड़खाने में डलबा दिया था। आज भी उच्च वर्णीय सांप्रदायिक लोगों की ऐसी ही विचारधारा है। बेमना पूरी तरह गुरु रविदास जी की बहुमुखी क्रान्ति के अनुयायी बन गए थे, जिसके कारण उन्होंने आजीवन ब्राह्मणवाद को नेशतनाबूद करने केलिये कड़ा संघर्ष किया था।
श्री जसबीर जस्सी (सोहम-सतगुरु रविदास जी, पृष्ठ-160) के अनुसार, सन्त कमाल ने भी गुरु रविदास जी का स्मरण करते हुए कहा है :----
आप वणे बनजारा,संग रविदास कमाल बै।
हे हरि हे हरि होती आईं, गुण छई अरु पालरे।।
उपरोक्त ब्राह्मणवादी सोच से स्पष्ट ज्ञात होता है कि शूद्र वर्ण में जन्में महापुरुष चाहे कितने ही विद्वान हों, कितना ही अच्छा ज्ञान देते हों, ब्राह्मण उन्हें कोई महत्व नहीं देते थे और ना ही उनकी पुस्तकें छपने देते थे, यही वह कारण था, जिससे भारत के मूलनिवासी लेखकोँ का कोई इतिहास नहीं बन सका, मगर गुरु रविदास जी ने असाध्य को साध्य बनाकर भारतीय मूलनिवासी साहित्यकारों की परंपरा शुरू की थी।
।।सोहम।।जय गुरुदेव।।
रामसिंह शुक्ला।
अध्यक्ष।
विश्व आदिधर्म मंडल।

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