।।गुरु रविदास जी और मंदिर-मस्जिद समरसता।।
।।गुरु रविदास और मंदिर-मस्जिद एकता।।
गुरु रविदास जी महाराज, मदिरों, मस्जिदों, चर्चो बुद्ध विहारों की बनाबटों को देखकर भी बड़े ही अचंभित थे। विश्व में इन्हीं धर्म स्थानों पर अरबों खरबों रुपयों को पानी की तरह बहाया गया है, जिनमें धर्मो का प्रवचन सत्संग निरन्तर चलता रहता है, घँटे, घड़ियाल, घण्टियाँ, शँख निरन्तर बजते रहते हैं, जोर जोर की चीखें दिनरात गुरु घरों से निकलती रहती हैं, कोई सफेद कोई लाल, कोई पीला, कोई गेरूआ, कोई नीला, कोई पीला चोला पहन कर, अपने अपने भगवानों के घरों में जाकर, अपनी भक्ति बफादारी का सबूत देते आते हैं मगर किसी की आत्मा में इंसान के प्रति इंसानियत देखने केलिये नहीं मिल रही थी।सभी धर्मो के बफादार, अपने अपने पूजाघरों के आकार भिन्न भिन्न बनाए हुए हैं और उन्हें दूसरों से श्रेष्ठ और भव्य मानते हैं मगर गुरु रविदास जी महाराज, लिखते हैं:----
मंदिर मस्जिद दोऊ एक हैं, इनमें अंतर नाहिं।
रविदास राम रहमान का झगड़ा, कोउ नाहिं।
गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं कि, मंदिर मस्जिद दोनों ही एक हैं, जिनमे कोई भी फर्क, अंतर, नहीं है, फिर राम और अल्लाह की जहां इबादत होती है, अरदास होती है, आरती होती है, उस में भी अंतर नही होता, फिर इनके घरों के आकार अलग अलग क्यों ? ये जो एक ओंकार के घर अलग अलग किस्म के बनाए गए हैं, किसी मॉनवतावादी इंसान की सकारात्मक सोच नहीं है, अगर होती तो इनके आकार उसी प्रकार एक जैसे होते, जिस प्रकार इंसानों के, सभी प्रकार के पक्षियों के, गधों के, घोड़ों के, शेर, चीतों के होते हैं, मगर आदमी के सारे अंग प्रत्यंग तो एक जैसे ही हैं, सभी इंसानों का रहना सहना, खाना पीना भी एक समान है, फिर इनके पूजा स्थल क्यों भिन्न भिन्न हैं। ये मॉनवता के दुश्मनों की अति घिनोनी हरकतें हैं, इंसानियत के दुश्मनों की काली करतूतें हैं, इन लोगों ने अपना अपना नाम इतिहास में चमकाने केलिये ही मॉनवता विरोद्धि दीवारें खड़ी कर रखीं हैं, जब रहमान और राम में अन्तर नहीं है तो उनके पूजास्थलों में अंतर क्यों बनाया गया है। जहां तक ईश्वर के कार्य हैं, वहां तक कोई भेदभाव नहीं है मगर जो जो रचनात्मक कार्य इंसान ने किए हैं, उन सभी में भेदभाव उतपन्न किए गए जिससे इंसान ही इंसानों का दुश्मन बन गया है। सतगुरु कबीर साहिब जी लिखते हैं:-----
कंकर पत्थर जोड़ी कै, मंदिर मस्जिद लये बनाय।
तां चढ़ बांग दै मुल्ला, क्या बहरा हुआ खुदाय।।
कबीर साहिब भी हिन्दू मुसलमानों की भेदभाव की कुटिल नीतियों का पर्दाफाश करते हुए, बड़े क्रांतिकारी अंदाज में फरमाते हैं कि, कंकर पत्थर इकठ्ठे करके उनसे चार दीवारें बना कर, इंसानों के भीतर भी दीवारों को बना कर, कोई घण्टे, घड़ियाल बजा कर भगवान के कानों तक अपनी आडंबरी भक्ति की जोरदार आवाज पहुंचाते हैं, मुसलमान भी जोर जोर से चिल्लाते हुए, कहते हैं कि अल्ला हूँ अकबर, की आवाजें निकालते हैं। क्या अल्लाह और भगवान दोनों ही कानों से बहरे हैं कि जिन्हें सुनाई ना देने के कारण ही जोर जोर से चिल्लाना पड़ता है ? गुरु रविदास जी लिखते हैं:------
जब सम करी दोऊ हाथ पग,नैन दोऊ अरु कान।
रविदास पृथक कैसे भये, दोऊ हिन्दू मुसलमान।
गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि, जब सभी मॉनव जाति के हाथ, पैर, नयन और कान एक समान हैं, तब फिर हिन्दू मुसलमान दो कैसे हो गए हैं। गुरु रविदास जी का मंदिर तो अनोखा ही मंदिर है जिसका रूप, रंग आकार वे बताते हैं:-----
जल की भीत पवन का थंभा, रक्त बूँद का गारा।
हाड़ मांस नाड़ी को पिंजरू, पंखी बसै विचारा।।
गुरु रविदास जी का मंदिर तो ऐसा है, कि उसे भगवान के अतिरिक्त कोई भी नहीं बना सकता। वे उस मंदिर के बारे में बताते हैं कि, मेरे मन्दिरों की दीवारें पानी से बनी हुई हैं, उसके पिल्लर (थंबे) वायु से बने हुए हैं। इन की दीवारें खून के गारे से चिनवाई गईं हैं। ये हड्डियों के पत्थरों को मास रूपी लोहे से ग्रिप में बांध कर पिंजर रूपी मंदिर बनाया गया है, जिसके बीच तपस्या करने वाला प्राणी रहता है। वे आगे लिखते हैं:----
ऊँचे मन्दर साल रसोई।।
एक घड़ी फुनी रहनु ना होई।।
गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं कि, ये जो ऊंचे मंदिर, मस्जिद, चर्च, गिरजाघर और मठ बनाए है, जिसमें तूने अपनी सुख सुविधा केलिये रसोई आदि खाने (केविन) बनाए हुए हैं, जब आदिपुरुष का संदेश आता है, तब इन में घड़ी भर भी रहने नहीं मिलता अर्थात ये मठ, मंदिर, क्षणिक है, ना जाने इससे बाहर कब निकलना पड़े, गुरु जी आगे कहते हैं:----
रविदास हमारो राम जोई, सोई है रहमान।
काबा काशी जानिये, दोऊ एक हि समान।
गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि, जो हमारे राम हैं वही रहीम हैं इसीलिए काबा और काशी को भी एक ही समान समझो।
मस्जिद सों कछु घिन नाहिं, मंदिर सों नाहिं पिआर।
दोऊ माहिं अल्ला राम नाहिं, कहि रविदास चमार।
गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि, हमें मस्जिद से कोई नफरत नहीं है,ना ही मंदिर से प्यार ही है। रविदास चमार फरमाते हैं कि, अल्लाह और राम भी दोनों ही घरों के अंदर नहीं रहते हैं अर्थात वह तो मन मंदिर में ही निवास करता है, ये तो ढोंगी, ठगों लुटेरों के अड्डे हैं, जहां पर सरेआम संगतों को ठगा औऱ लूटा जाता है।
तीन लोक से भिन्न है, परम पुरुष का वास।
जहां किसी कु गम नाहिं, ताहिं रहे रविदास।।
गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि, धरती आकाश पाताल तीनों लोकों की अपेक्षा, श्रेष्ठ आदिपुरुष का निवास सांसारिक जीवोँ के निवास से अलग ही है, जहां किसी को दुख, दर्द, गम और कोई भी लालच नहीं है, वहीं पर हम सभी रहते हैं। गुरु रविदास महाराज ने, समूची मॉनव सभ्यता की तुलना अन्य प्राणी जगत से करके, मॉनव की मॉनव के प्रति ही घृणा, द्वेष को जगजाहिर किया है, जिससे मॉनव को सबक सीख कर प्रकृति के अनुसार, जीवन जीना चाहिए। कोई भी पूजा घरों में अंतर नहीं होना चाहिए, कोई भी रंग विरंगे पहरावे नहीं होने चाहिए, अरदास, इबादत भी एक ही हो, तभी धरती पर बेगमपुरा नजर आएगा।
।।सोहम।।जय गुरुदेव।।
रामसिंह शुक्ला।
अध्यक्ष।
विश्व आदिधर्म मंडल।
जून 22,2020।
Comments
Post a Comment