।गुरु रविदास जी की पोथीसाहिब की प्रमाणिकता

गुरु रविदास की लुप्त "पोथीसाहिब" की प्रमाणिकता।
गुरु रविदास जी महाराज, ने पांच हजार साल से चली आ रही मूलनिवासी भारतीयों की गुलामी को समाप्त करने का, जो क्रांतिकारी अभियान शुरू किया था, उसने ब्राह्मणवाद की जड़ें खोखली करके, नए युग की शुरुआत कर दी थी। एक सौ इक़ाबन वर्ष तक कई राजाओँ, महाराजाओं और बादशाहों के साथ जो सँघर्ष किया, उसकी मिशाल कहीं, किसी भी अवतार, किसी पैग़ंबर की नहीं मिलती, ये सौभाग्य, केवल भारतीयों को ही मिला था, जिस का लाभ, भारतीयों को, ब्राह्मणों ने लेने ही नहीं दिया। गुरु रविदास जी ने ही, सबसे पहले समाजवाद की नींव रखी थी, जिसका जीता जागता प्रमाण गुरु जी की ये दो पंक्तियां है।:----
ऐसा चाहूं राज मैं, जहां मिले सबन को अन्न।
छोट बड़ सब सम वसै तां रविदास रहें प्रसन्न।
तमाम देशों ने गुरु रविदास जी के इस दिव्य, अलौकिक सिद्धान्त को अपना कर, अपने अपने देशों को उन्नत ही नहीं किए अपितु अमीर भी बना लिए मगर भारत में गुरु रविदास जी के अमूल्य सिद्धान्तों को, ब्राह्मणों ने जातिपाति के नाम पर बलि चढ़ा दिया। यदि डेढ़ शताव्दी तक, अगर गुरु रविदास जी को, राजगुरु ही बनाकर, शासन चलता, तो आज भारत, विश्व की सर्वोच्च शक्ति ही नहीं, संसार की राजधानी भी दिल्ली में ही होती। ब्राह्मणों ने गुरु रविदास जी की अमूल्य नीतियों का लाभ तो क्या लेना था, उन्हें, राजाओँ और बादशाहों के पास झूठे मुकद्दमों को ही भुगतने से फुर्सत, मिलने ही नहीं दी। गुरु रविदास जी ने, जो सिद्धान्त जनता को दिए, वे भी उनके ब्रह्मलीन होते ही मिटा दिए। रामचरण कुरील जी अपनी पुस्तक सत्य कथा में लिखते हैं कि, कांशी में, गुरु रविदास जी के पिता सन्तोषदास जी ने ही, गोल्डन टेम्पल बनबाया था, जिसका मानचित्र उन्होंने, अपनी पुस्तक सत्य कथा में भी दिया हुआ है। उन्होंने जगह जगह घूम कर, गुरु जी के इतिहास को ढूंढकर, कुछ तथ्य पुस्तक में संकलित किए हैं, मगर आर्थिक तंगी के कारण, वे गुरु जी के अमूल्य इतिहास को पूर्णरूपेण ढूंढ नही सके, मगर जो उन्होंने खोज की है, उससे गुरु रविदास जी के जीवन, आध्यात्मिक, राजनैतिक दर्शन, अर्थ शास्त्र, समाज शास्त्र और समाज सुधार के विषय में अनुमान, स्वत ही हो जाता है, गोल्डन टेम्पल के चित्रण से, पूर्णरूपेण ज्ञात होता है, कि उसी की नकल करके, गुरु नगरी अमृतसर में भी गोल्डन टेंपल की, ऐतिहासिक नींव रखी गई थी।
गुरु नानकदेवजी ने, अपने आरंभिक जीवन में, कांशी जाकर, गुरु रविदास जी के दर्शन करके जो चालीस शव्द, मर्दाने से लिखवा कर लाए थे, वही गुरु रविदास जी के साहित्य का सत्य प्रमाण मिल रहा है, मगर उनमें से भी गुरु जी के केवल 22 शव्द ही, गुरु ग्रँथ साहिब में शामिल किए गए हैं। गुरु रविदास जी की यही वास्तविक और प्रमाणित वाणी है, बाकी सारी वाणी, गुरु शिष्य परंपरा से ही इकठ्ठी की गई है।
अब जो गुरु रविदास जी की वाणी का प्रशन उठता है, वह ये है, कि कबीर साहिब, नामदेव जी, सेन जी और मीराबाई आदि समकालीन गुरूओं की वाणी तो काफी मात्रा में मिलती है मगर उनके गुरु रविदास जी की वाणी कहाँ चली गई है ? गुरु रविदास जी महाराज, उस समय ब्रह्मण्ड के सूर्य थे, बाकी तो उनके समक्ष सितारे ही थे, तुलसीदास, सूरदास आदि तो उनके सामने तारे भी प्रतीत नहीं होते हैं, ब्राह्मणवाद के कारण, जिनका ही साहित्य भारत के सभी स्कूलों, विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में भरा पड़ा है, जिन की नकल करके, आगे चल कर केशवदास और बिहारी आदि कवियों ने करके, नारी को केवल मर्द के हाथ का खिलौना बनाकर प्रस्तुत किया है, मगर गुरु रविदास, कबीर, नामदेव, सेन, मीराबाई की वाणी में कहीं भी श्रृंगार की बदबू सूंघने को भी नहीं मिलती, मिलती है ये बदबू, तो सवर्ण कवियों और सगुण धारा के कवियों, लेखकों में ही मिलती है। निर्गुण धारा की विभूतियों ने ही, सत्य के मार्ग चल कर, चरित्र की देहली पर बैठ कर, आदर्श मंजिल की ओर यात्रा करके, अद्वितीय ही नहीं अपितु मर्यादित रचनाऐं रचकर, आदर्श और मर्यादित समाज की नीँव भी रखी थी।
गुरु रविदास जी के नेतृत्व में, सभी गुरूओं ने ही नहीं, अपितु तत्कालीन, धार्मिक नेताओं, राजाओँ, बादशाहों, ज्ञानियों, अमीरों ने गुरूओं को आमंत्रित करके हजारों कवि समागम, सन्त सम्मेलन और गोष्ठियां के आयोजन करवाए थे, जिनका विवरण, गुरु रविदास जी की वाणी में मिलता है।ब्राह्मणों ने गुरु रविदास जी को, आठ वर्ष की आयु में ही, गढ़ाघाट पर बुलाकर, ब्राह्मण प्रकांड पंडितों ने, पहले धार्मिक वहस की, जिसमे वे बुरी तरह निरुत्तर हुए, फिर गुंडागर्दी पर उतरे, फिर तलबारें उठाकर, भाले, लाठियों से प्रहार करने लगे, मगर उनके औजार हवा में ही रुक गए, गुरु जी की ओर आने पर आंखों से दिखाई ही ना दे, सभी भयभीत होकर, पाँव पकड़कर, माफी मांग कर, अपनी जान बचाकर घर वापस आए। कांशी और चितौड़गढ़ तो गुरु रविदास जी की परीक्षाओं का परीक्षा केंद्र ही बन चुके थे, महारानियाँ झालाबाई, मीराबाई ही नहीं, पास पड़ोस के राजे रानियां भी वहां आकर, गुरु जी के प्रश्नों और उनके उत्तरों को सुनकर, हैरान होकर, गुरु रविदास जी से दीक्षा लेकर, इस जन्म को सफल बनाते रहे। राजा नागरमल, पीपा, राणा संग्रामसिंह उर्फ राणा सांगा, राणा कुंभसिंह, राणा रायमल, राणा भोजराज, राणा विक्रमादित्य, राणा रतनसिंह, राजा दूदाराव, राजा रतनसिंह, बादशाह अहलाबादी, सिकन्दर लोधी, बाबर, सतगुरु गुरुनानक देव, गुरु गोरखनाथ, पण्डित रामानंद, पंडत परमानंद, सहित कई सिद्धों, नाथों, योगियों, वैरागियों, मुल्लों, काजियों, पादरियों के साथ उनकी गोष्ठियां हुई थी, कई सन्त सम्मेलन हुए थे, जिनके केवल दृष्टांत ही, गुरु रविदास व अन्य गुरूओं की वाणी में मिलते हैं , मगर वास्तव में वे प्रमाणिकता के आधार पर आज उपलब्ध नहीं हैं। सन्तों की गोष्ठी में गुरु जी फरमाते हैं:-----
कहि रविदास सुणो, रे सन्तों----------------।
राजाओँ के साथ हुई गोष्ठियों का अनुमान हम गुरु जी के इस कथन से लगा सकते हैं कि:----
नागर जनां मेरी जात बखिआत चमारँ।
सन्तों, पीरों, गुरूओं, धार्मिक विद्वानों से हुई चर्चाओं को भी हम उनके ही शव्दों से जान सकते हैं:-----
मेरा टांडा लादिया जाए रे--------------।
सन्त घाट पर तो विश्व सन्त सम्मेलन हुआ था जहाँ ऐतिहासिक निर्णय लेकर, सभी सन्तों ने गुरु मंत्र को अंतिम रूप दिया था। देश विदेश में मॉनवतावादी सन्देश देने केलिये, सन्तों को कार्यभार सौंपा गया था। गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि:-----
मैं राम नाम धन लादिया-------------------।
इस सत्य को गुरु नानकदेवजी, गुरु अर्जुन देव आदि महापुरुष भी स्वीकारते हैं, कि गुरु रविदास जी के इलाबा, उच्चतम शिखर पर कोई भी सन्त महापुरुष नहीं पहुँच सका था, फिर उनकी वाणी का लुप्त हो जाना, सीधा ब्राह्मणों की ओर ही संकेत करता है, क्योंकि इन्होंने ही गुरु जी को षडयंत्रों, जबाबदेहियों में उलझाए रखा था। उनके समकालीन सन्तों की वाणियां, पोथियों के रुप में मिलती हैं मगर गुरु रविदास जी की कोई पोथी क्यों नहीं मिलती, केवल गुरूओं की लिखी वाणी में ही, गुरु रविदास जी की "पोथीसाहिब" का जिक्र मिलता है। लगता है कि ज्यों ही गुरु रविदास जी ब्रह्मलीन हुए, गुरु रविदास जी की सारी वाणी, देश विदेश में उनके द्वारा बनवाए गए हजारों मंदिर, सभी ब्राह्मणों ने जला दिये थे।
।।सोहम।। जय गुरुदेव।
रामसिंह शुक्ला।
अध्यक्ष।
विश्व आदिधर्म मंडल।

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