।गुरु रविदास का पोथीसाहिब और विश्व शान्ति।

गुरु रविदास जी, राजाओँ, महाराजाओं, खूंखार बादशाहों की तानाशाही से पूर्णरूपेण परिचित हो गए थे, वे ब्राहमणों की घात नीति को भी अच्छी तरह से परख चुके थे, वे जानते थे, कि तानाशाह शासकों के पास कोई दलील अपील नहीं चलती, वे जानते थे कि, ब्राह्मण हमेशा शासकों को गुमराह करके, उनकी चापलूसी, उनकी झूठी प्रशंसा के पुल बांधकर, उन्हें उल्लू बनाकर अपना उल्लू सीधा करते हैं। शासकों और ब्राह्मणों की युगलबंदी ही, प्रजा का शोषण करती है, यही युगलबंदी भोलीभाली प्रजा के ऊपर अत्याचार करती है, बलात्कार, भ्रष्टाचार, अन्याय, अनाचार, इन्हीं की बदौलत होते हैं। गुरु रविदास जी ने इस समस्या का समाधान ये ढूंढा कि, जनता ही, जनता में से, चरित्रवान व्यक्तियों को, निश्चित समय केलिये, अपना शासक खुद ही चुने, वे जानते थे कि, जनता के वोट से जो राजा चुना जाएगा वह, जनता और सँविधान से डर कर, ईमानदारी से काम करेगा, नहीं करेगा तो मरेगा क्योंकि पुनः जनता उसे वोट नहीं देगी और वह कभी जनता के बीच नहीं जा पाएगा, जाएगा तो प्राणों के लाले पड़ेंगे, इसीलिए गुरु रविदास जी ने बेगमपुरा की कल्पना की थी:----
रविदास जु है बेगमपुरा उह पूरण सुख धाम।
दुख आन्दोहु द्वेष भाव नाहिं बसहिं तिहि थांम।
गुरु जी, स्वराज को ही सुख शान्ति, समृद्धि का आधार मानते थे, पराधीनता में प्राणी सुखी नहीं रहता है। वे फरमाते हैं:-----
पराधीनता पाप है, जान लेहु रे मीत।
रविदास पराधीन सौं, कौन करै हैं प्रीत।।
गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि, हे मित्रो ! समझ लो, पराधीन अर्थात गुलाम के साथ कोई, ना तो मित्रता करता, ना ही प्यार। वे आगे फरमाते हैं:----
रविदास मानुष करी बसन कूं सुख कर दुई ठांव।
इक सुख है स्वराज माहिं दूसर है मरघट गाँव।।
गुरु रविदास जी, फरमाते हैं कि, मनुष्य के रहने केलिये दो ही स्थान हैं, पहला सुख से रहने के लिए घर है, दूसरा श्मशानघाट। वे विश्व की सुख समृद्धि केलिये, वैश्विक धर्म, वैश्विक धर्मग्रन्थ, वैश्विक सरकार को ही महत्वपूर्ण मानकर, ऐसी व्यवस्था की स्थापना में जुटे रहे।
विश्व धर्मग्रन्थ वैश्विक शांति का आधार:----सभी देशों के अपने अपने पंथ और ग्रँथ हैं, जिनकी रचना भी सत्पुरुषों ने ही की हुई है, जिनके सिद्धान्त भी मिलते जुलते ही हैं मगर उनके संचालकों ने ऐसी कठोर दीवारें बना रखीं हैं,कि मॉनव, मॉनव बनकर कर नहीं रह पाता, हैवान और जानवर से भी बदतर बन चुका है। एक ग्रँथ का ठेकेदार दूसरे ग्रँथ को हेय दृष्टि से देखकर, उसके धर्म को अपने धर्म से निम्नतम स्तर का मानता आ रहा है, जिससे सारे विश्व में तनाव, खूनखराबा, हत्याएं, युद्ध होते जा रहे, मॉनव मॉनव के खून का प्यासा बना हुआ है, मॉनवता को भूल चुका है, हैवानियत का खेल खेलता जा रहा है, वादशाह सिकन्दर लोधी की तलबारें इस्लाम स्वीकारने वालों पर मेहर करती थी, ना करने वालों का खून बहाती थीं, औरंगजेब की तलबारें भी प्रतिदिन यही काम करती थीं, ईसाई बाईबल के प्रचार प्रसार पर अरबों डॉलर व्यय करते जा रहे हैं। इस्लाम के ठेकेदारों ने लाखों लोगों को मौत के घाट उतार रखा है। क्यों मॉनव, मॉनव का कत्ल करता, क्यों कोई शासक बिना दलील अपील के, लोगों को कारागार में बन्द करता हैं, सोचा किसी ने, नहीं, वस अपने धर्म को देखकर, हत्यारे की पीठ ही थपथपाने में खुशी का इज़हार करते हैं।
इन अत्याचारों का एक ही समाधान है कि, सारे संसार केलिये विश्वग्रँथ ही एक हो, जिसमें विश्व गुरूओं की वाणियों को शामिल करके सँयुक्त सत्संग क्षेत्रीय भाषाओं, बोलियों में दिया जाए, ईसा मसीह, पैगंबर मुहम्मद, गुरु रविदास, कबीर साहिब, वाल्मीक, विवेकानंद, गुरु नानकदेवजी आदि सत्पुरुषों की वाणियों से, जब विश्व की संगत सराबोर होगी, तो क़भी भी जातीय दंगे, धार्मिक उन्माद, सामाजिक तनाव नहीं जन्मेगे। यही गुरु रविदास जी का रोड मैप था और विजन था।
विश्वधर्म की स्थापना:----यदि संसार अनादिकाल से चलता आया है, तो फिर धर्म का नामकरण भी, आदिकाल ही क्यों ना किया जाए, जिसे विश्वधर्म के रूप में, विश्व स्वीकार करे। विश्व में मुख्यतः (आदिधर्म, क्रिश्चियन, इस्लाम) तीन धर्म ही हैं, उनका एक ही(आदिपुरुष उर्फ गॉड उर्फ अल्लाह) मुखिया है।
इस्लाम के सिद्धांत:----इस्लाम एकेश्वरवादी धर्म है। इस धर्म का मूलभूत सिद्धांत, अल्लाह का सर्वशक्तिमान, एकमात्र अल्लाह है और वही जगत का पालक है, हजरत मुहम्मद उनका सन्देशवाहक अथवा पैगम्बर है। यही तथ्य उनके कलमें में बार बार दोहराई जाता है:-----
"ला इलाहा इल्लल्लाह मुहम्मदुररसूलुल्लाह", अर्थात अल्लाह एक ही है, उनके अतिरिक्त दूसरी कोई सत्ता नहीं है,केवल मुहम्मद उसके रसूल अर्थात पैगम्बर हैं। इस्लाम के मुख्य पाँच सिद्धांत हैं:------
शहादा:-----साक्षी अर्थात अल्लाह ही सर्वोपरि सत्ता है, उसे ही परमेश्वर कहा गया है, उसके अतिरिक्त कोई नहीं है।
सलात:-----इबादत या प्रार्थना, करना अति आवश्यक है, जिससे इंसान अल्लाह के प्रति अपनी कृतज्ञता को प्रदर्शित करता है।
सोम:------व्रत रखना, इंसान शरीर की स्वच्छता और एकाग्रता केलिये व्रत रोजा रखता है, जो सूर्योदय से सूर्यास्त तक रहता है।
जकात:------दान देना, जकात इंसान केलिये अति आवश्यक है, क्योंकि अल्लाह का फरमान है कि, अपनी हक हलाल की कमाई का 2.5 प्रतिशत भाग दर्दमन्दों की सहायता केलिये दिया जाए, जिससे उन पीड़ितों को भी इमदाद मिल सके।
हज:------हज अर्थात तीर्थ यात्रा करना, इस्लाम का ये पांचवां नियम है कि, मक्का की तीर्थ यात्रा अवश्य की जाए ताकि आत्मा को घूम फिर कर शकून, आराम के कुछ पल मिल सकें।
क्रिश्चियन धर्म के सिद्धांत:-----क्रिश्चियनों के पवित्र धार्मिक ग्रँथ बाईबल में फरमान है, कि गॉड, मनुष्य को पवित्र बनाने, आराधना करने, तथा प्रकृति के नियमानुसार जीवन बिताने का आर्डर देता है, बाईबल के दूसरे भाग से ज्ञात होता है कि, ईसा मसीह ने ईश्वर के बारे में एक नया विचार व्यक्त करते हुए कहा है, कि एक ही ईश्वर में तीन व्यक्ति निवास करते हैं, पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा, जिसका सीधा अर्थ है कि, ईश्वर की सत्ता है और वही सबसे बलवान है।बाईबल पुनः कहती है कि, ईश्वर एक है और वह अनादि अनंत और सर्वशक्तिमान है। ईश्वर प्रकृति के नियमानुसार जीवन बिताने का आदेश देता है। वे ईश्वर के राज्य की बात करते हैं, वे ईश्वर को पिता की संज्ञा देकर अपने आपको उसका पुत्र मानते हैं, जो भक्ति से एकाकार हो जाते हैं परन्तु हैरानी की बात ये हुई कि इस मत के भी पाँच संप्रदाय क्यों बने:------
रोमन कैथोलिक
योनी टैरिपन
यूटल केन
वाल कानिया
प्रोट्रेस्टेन
फिर पुरानी बाईबल और नई बाईबल का बंटबारा क्यों अस्तित्व में आया? एक धर्म में भी दो दो रास्ते बनाकर फिर मॉनव को विभाजित क्यों किया गया?
तीसरा धर्म है आदिधर्म:-----आदिधर्म पूर्णरूपेण, नेचर यानी प्रकृति के अनुसार और उसी के सिद्धांतों के अनुरूप है। आदिपुरुष से चली आ रही, वंशावली से ज्ञात होता है कि, आदिपुरुष आपो आप निरंजन, इन तीन शव्दों में ही अभी मतों का सार छुपा हुआ है, जिस प्रकार नेचर अपना कार्य निर्बिघ्न दिनरात करती रहती है, हर दिन अपने नए रूप में दृष्टिगोचर होती है, तनिक भी अपने उसूलों से नहीं फिसलती, उसी का अनुकरण, आदिधर्म करता है, यही वह धर्म है जो कहता आया है, "अहं ब्रह्मास्मि" जब आत्मा सो सो करती हुई, श्वास को दसवें दर तक ले जाकर कुछ क्षणों केलिये रुक जाती है, फिर धीरे धीरे हम हम करती हुई नाभि के ऊपर विश्राम करती है और जब बार बार इस क्रिया को निरन्तर करती रहती है तो "सो और हम" एकाकार हो जाते हैं, जिसे अद्वेत कहा जाता है, आदिधर्म के भी सात नियम हैं।
आदिपुरुष सर्वोच्च है:--गुरु रविदास जी महाराज आदिपुरुष की सत्ता पर गहन प्रकाश डालते हुए फरमाते हैं:-----
बिन देखे उपजै नहीं आसा।
जऊं दीसे सो होई विनासा।।
वरण सहित जौ जपै नामु।
सो जोगी केवल निहकामु।।
गुरु रविदास जी स्पष्ट करते हैं कि, परम् शक्ति को देखे बिना, उसके प्रति इच्छा ही नही पैदा होती है। आत्मा उसी परमात्मा का अंश है,
परमात्मा हर प्राणी के घट घट में विद्यमान है
सोहम एक मार्ग :-----आदिपुरुष के मिलन का आधार केवल सोहम ही है।
जय गुरुदेव सम्मान का प्रतीक है :-----गुरु का शाब्दिक अर्थ होता है, "बड़ा" तो फिर बड़ा केवल आदिपुरुष ही है, तो हमें उसी की ही जय जयकार करनी चाहिए ना कि इंसान की।
दक्षसांश :-----गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं कि, हर आदमी को अपने हक हलाल की कमाई का दसवां अंश अर्थात भाग जन कल्याण पर खर्च करना चाहिए।
मन मंदिर :-----गुरु रविदास जी की धारणा है कि, अपने घर के बीच ही, मन रूपी मंदिर में सोहम का जाप किया जाए, वहीं आदिपुरुष आएंगे, अगर तुम जंगल में ध्यान लगाओगे, तो आदिपुरुष जंगल में ही आपको ढूंढेंगे, मगर अपने निवास पर याद करेंगे तो वे आपके ही घर में आएंगे, जिससे घर में कोई आधि, व्याधि उपाधी नहीं आएगी।
आरती :----गुरु जी ने आदिपुरुष की स्तुति में अति अतुलनीय आरती की रचना करके काल्पनिक देवताओं के फंदे से छुटकारा दिलाया है, वे फरमाते हैं:-----
नाम तेरो आरती मंजन मुरारे,
हरि के नाम बिनु झूठे सगल पसारे।।
नामु तेरो आसनों नामु तेरो उरसा।
नामु तेरो केसरो लै छिटकारे।।
नामु तेरो अंबुला नामु तेरो चन्दनों।
घसि जपै नामु लै तुझहिं को चारे।।
नामु तेरो दीवा नामु तेरो वाती
नामु तेरो तेल लै माहि पसारे।।
नामु तेरो की जोत जगाई ।
भइयो उजियारो भवन सगलारे।।
नामु तेरो धागा नामु तेरो फूलमाला।
भार अठारह सगल जूठारे।।
तेरा दिया तुझहि को अरपउ।
नामु तेरो तूंही चँवर ढुलारे।।
दस अठा अठसठे चारे खानीं।
इहै वरतणी सगल संसारे।।
कहे रविदास नामु तेरो आरती।
सतिनामु है हरि भोग तुहारे।।
गुरु रविदास जी ने फरमाया है कि, हे ईश्वर तेरा नाम ही आरती है, जिसके समक्ष कोई भी ऐसी पवित्र वस्तु नहीं है जिसका आपको भोग लगाया जा सके। गुरु रविदास जी ने, किसी भी दूसरे अवतार, पैगंबर, देवी देवता का आरती में तनिक भी जिक्र नहीं किया है, जो गुरु जी के एकेश्वरवाद की शतप्रतिशत साक्ष्य है, उनके समक्ष केवल, इस्लाम और क्रिश्चियन धर्मो के समान, एक निराकार को ही सर्वोच्च मॉन कर, अपनी आस्था की चरम सीमा व्यक्त की है, जिस प्रकार की, कहीं भी कोई भी आरती, विश्व के किसी भी संप्रदाय की नहीं मिलती है।
मॉनव जीवजंतु प्रकृति के श्रृंगार:----गुरु रविदास जी ने प्राणी हत्या को निषिद्ध माना है और फरमाया है कि, ये सभी जीवजंतु, पक्षी प्रकृति के श्रृंगार हैं।
आदिधर्म ही एक ऐसा धर्म है जो कहीं भी, किसी भी प्राणी की हत्या करने की अनुमति नहीं देता है और ना हीं वकालत करता है, किसी की आत्मा को दुखी नहीं करता, किसी के हक को नहीं खाता, किसी से अन्याय नहीं करता, किसी को भी अपने धर्म की श्रेष्ठता, उच्चता नहीं बताता, जबकि इस्लाम और क्रिश्चियन धर्मों के संघर्षों में, सदियों से खून की नदियां वहती आ रहीं।
आदिधर्म निराकार को सर्वोच्च मनाता है, इस्लाम अल्लाह को अजन्मा मॉनता है, क्रिश्चियन धर्म एक ही गॉड को पिता मानकर, जीवात्मा को उसका पुत्र मॉनता है।
जब आदिधर्म, इस्लाम, क्रिश्चियन तीनो धर्मो के नियम समान हैं, तो फिर इनकी अलग अलग दुकानें क्यों चलती हैं, दुनियाँ के तीन धर्म अलख, अगम, अगोचर, अदृश्य, निर्गुण, अपरम्पार, निराकार परम शक्ति को ही संसार का नियंत्रक स्वीकार करते हैं, जिनके सिवाए कोई धर्म धरती पर है ही नही, फिर आपस में क्यों शत्रुता पनपी हुई है, यही चितन का गंभीर और विचारणीय विषय है।
मुसलमान निराकार शक्ति को मानते, ईसाई भी गॉड कह कर यही दर्शाते हैं, आदिधर्म तो केवल आदिपुरुष को ही सर्वोच्च शक्ति मानता है, फिर क्यों इनके आदर्श पुरुषों के नाम से धर्मो का सृजन किया गया, कुछ इस्लाम और क्रिश्चियन के अनुयायी तो आपस में, खून की नदियां बहाते आए हैं, एडोल्फ हिटलर, बेनिटो मुसोलिनी, व्लादिमीर ईलीईच लेनिन, जोसेफ स्टालिन, माओ जे दोंग उर्फ माओ, मुअम्मर गदाफी, ईदी अमीन, सद्दाम हुसैन, याह्या खान, मोहम्मद जियाउलहक, होस्नी मुबारक, आयतुल्लाह खुमैनी, पालपाट, किंग अब्दुल्लाह, अल उमर बशीर, अलेक्जेंडर लुकाशेकी निकोलाई चाऊशेसकू आदि इंसानों ने लाखों लोगों को, जिनके खून पसीने की कमाई खाकर उन्हें ही बड़ी निर्ममता से कत्ल किया है, इन्हें जनता को कत्ल करने का हक किसने दिया है ? इनके नरसंहारों को समूचा संसार आंखे मूंदे देखता रहता, उधर धर्म के ठेकेदारों ने, ईसा मसीह और मंसूर जैसे महापुरुषों को सूली पर चढ़ा दिया मगर दर्शक मूक बनकर देखते रहे, किसी की पेश नहीं चली, कारण क्या हैं ?
कारण स्पष्ट हैं, अगर गुरु रविदास जी का बेगमपुरा विश्व मे स्थापित हुआ होता तो, उनके ब्रह्मलीन होने के बाद, जिन तानाशाहों के मैंने नाम गिनाए हैं, वे नरसंहार नहीं कर सकते थे। वैश्विक राष्ट्रपति, कभी भी ये अमानवीय रक्तपात नहीं होने देते मगर गुरु जी की विचारधारा के अनुसार केवल संयुक्त राष्ट्र संघ जरूर बनाया गया मगर वह, पूर्ण शक्तियों के अभाव में निष्क्रिय ही है। क्यों ना गुरु रविदास जी के सिद्धांत के अनुसार, केवल एक ही विश्वधर्म के नाम से, विश्वधर्म ग्रँथ को अपना कर, हम एकता के सूत्र में बंध जाएं, एक ही वैश्विक सरकार के नियंत्रण में शासन चले और सदभावना, प्यार और इंसानियत से जनता जिंदगी जिये।
।।सोहम।।जय गुरुदेव।।
रामसिंह शुक्ला।
अध्यक्ष।
विश्व आदिधर्म मंडल।

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