2मई।। गुरु रविदास जी की रचनाएं।।

।। गुरु रविदास और मूलनिवासी साहित्य।।
गुरु रविदास जी महाराज से पूर्व मूलनिवासियों की कोई साहित्यिक रचना मिलना दुर्लभ ही लगती हैं क्योंकि, गुरु जी के समय तक ब्राह्मणों के सिवाए, किसी मूलनिवासी, तो क्या राजपूत और वानिएं को भी शास्त्र विद्या हासिल करने, पढ़ने-लिखने का अधिकार था ही नहीं। मनुस्मृति के काले कानून के अनुसार, राजपूत केवल शस्त्र चलाना ही सीख सकता था, अक्षर ज्ञान हासिल नहीं कर सकता था, वाणियां भी केवल गिनती और वर्णमाला तक ही सीख सकता था। इसी कारण आज तक कोई भी राजपूत और वाणियां उच्च कोटि का विद्वान, लेखक, कवि, साहित्यकार नहीं बन सका। कोई भी ब्राह्मण वीर योद्धा नही मिलता, चाहे सारे इतिहास को ढूंढते रहो। आजादी के बाद मौलिक अधिकार मिले मगर राजसत्ता पुनः ब्राह्मणों ने अप्रत्यक्ष रूप से, अपने ही हाथ रखी जिसके कारण केवल जय शंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, हजारी प्रसाद द्विवेदी, रामचन्द्र शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी आदि सभी ब्राह्मण ही उभारे गए। अखबारों के मालिक तो वाणियां ही रहे मगर उनके संपादक ब्राह्मण ही बनते रहे, जो हमारे जैसे अछूतों की रचनाओं को कभी भी अखबारों में नही छापते थे। जो ब्राह्मणों के दलाल अछूत, गुरु रविदास जी, कबीर साहिब की क्रांतिकारी वाणी के खिलाफ, कोई कमेंट करते थे उन्हीं को वे उभारते रहे। उन्होंने ही गुरु रविदास जी को चर्मकार के रूप में लिखा और चित्रित किया। उन्हीं को ही सम्मानित किया, जो गुरु रविदास जी हत्या सिद्ध करते रहे उन्हें ही मीडिया में प्रचारित करते रहे।
अछूत ब्राह्मणवादी दलाल लेखकों ने, कभी भी ये खोज नहीं की, कि क्या कारण है कि पचासी प्रतिशत मूल भारतीयों में से, कोई भी उच्च कोटि का साहित्यकार क्यों नहीं हुआ। बस इन दलालों की पुस्तकों को छपाने केलिये, ब्राह्मणवाद धन उपलब्ध करवाता रहा और उन्हीं की तर्ज पर लिखकर अपने ही गुरूओं, महापुरुषों को मिट्टी में मिलाते रहे। सीएल चुंबर, लहौरी राम बाली आदि कुछ एक साहित्यकारों ने, मनुवाद की चीरफाड़ की, गुरूओं की क्रांतिकारी वाणी, डाक्टर भीमराव अंवेदकर के साहित्य को अछूतों तक पहुंचाने का प्रयास किया, जिससे उन्हें कई प्रकार की मुशीबतों का सामना करना पड़ा। जो कुछ ही मूलनिवासी साहित्यकार स्वाभिमानी निकले, उन्हें दलित साहित्य अकादमी बनानी पड़ी, जिस मंच से वे अपनी आवाज बुलंद करने लगे मगर वे भी सरकारी सहायता के बिना अपना लक्ष्य पूर्ण नहीं कर सके। ऐसा केवल साहित्य के क्षेत्र में नहीं हुआ, खेल जगत में, सांस्कृतिक जगत में, विज्ञान जगत में, रोजगार क्षेत्र में ब्राह्मणों ने अछूतों को उभरने नहीं दिया।
कबीर साहिब मुसलमान परिवार से जुड़ गए थे, जिन्हें मुसलमानों का प्रश्रय मिलता रहा, जिसके कारण उन्हें थोड़ा वहुत उभरने दिया गया, उनके साहित्य को जलाया नहीं गया, ना ही बर्बाद किया गया बल्कि उनकी वाणी को स्कूली पाठ्यक्रमों में भी शामिल किया जाता रहा मगर गुरु रविदास जी महाराज के पीछे किसी भी शासक का वरदहस्त नहीं था, जिसके कारण उनकी समृद्ध वाणी और साहित्य को नष्ट कर दिया गया, स्कूली पाठ्यक्रमों में तो नाममात्र ही उनका परिचय मात्र दिया गया, जबकि गुरु रविदास जी ही भक्तिकाल के सर्वश्रेष्ठ, सन्त, गुरु समाज सुधारक, क्रांतिकारी धार्मिक, और समाजवादी राजनेता थे। उनके साथ ब्राह्मणों के द्वारा अमानवीय व्यवहार किया गया, हर क़दम कदम पर उनके क्रांतिकारी आंदोलन में रोड़ा अटकाया गया। बेचारे नामदेव, सेन जी तो, आर्थिक, मॉनसिक और शारीरिक रूप से, इतने सक्षम नहीं थे कि वे, ब्राह्मणवाद का सामना कर सकते इसीलिए वे अधिक उग्र नहीं हो सकें। गुरु रविदास जी साधन संपन्न परिवार से संबध रखते थे, वे अपनी आय से निर्वाह कर लेते थे, जिस कारण उन्हें ब्राह्मणवाद के ऊपर निर्भर नहीं होना पड़ा। गुरु रविदास जी थे, भी आध्यात्मिक शक्ति संपन्न, जिसके कारण भी, ब्राह्मणवाद उनसे भयभीत हो चुका था। गुरु जी ने ब्राह्मणों की जो बखियाँ उधेड़ीं, उससे ब्राह्मण एकजुट होकर उनके खिलाफ लामबंद हो गया था, मगर बाबजूद इसके इन्होंने, गुरु रविदास जी से हर क्षेत्र में बुरी तरह से मुंह की खाई, पर फिर भी ये बड़ी बेशर्मी से डटे रहे और बार बार गुरु जी से पंगे लेते रहे, राजपूत राजे और मुस्लिम बादशाह भी ब्राह्मणों की मक्कारी को अच्छी तरह समझते थे और उन का दिमागी दिवाला निकालने केलिये, गुरु रविदास जी महाराज का सहारा लेते रहे। जब भी ब्राह्मण गुरु रविदास के खिलाफ, राजाओँ, बादशाहों की अदालत में उजर करते, फरियादें करते, शासक तत्काल गुरु जी को अदालत में हाजर होने केलिये आदेश कर देते। गुरु जी को बड़े सम्मान से, दरबार में बुलाकर कड़ी से कड़ी परीक्षा में उलझा देते, गुरु जी अपनी आध्यात्मिक शक्ति से, ब्राह्मणों को चित कर देते थे, ब्राह्मण भी गुरु रविदास जी की तर्कसंगत, दलीलों से अपना पक्ष, प्रमाणित कर देते जिससे राजपूत और बादशाह, उनकी जीत पर उन्हें सम्मानित भी करते थे और अपना गुरु भी बनाते थे, जिससे ब्राह्मण वहां से उल्लुओं की तरह मुंह लटकाए हुए, भरी अदालत से, भाग जाया करते।
इन्हीं परीक्षाओं के समय जो जो रचनाऐं, गुरु जी ने रचीं, उन्हें उसी समय, अत्यंत सुरीली आवाज में वे गा कर सुनाया करते थे, वे एक सशक्त गीतकार, कवि, लेखक और साहित्यकार भी थे, गुरु रविदास जी ने साहित्य की हर विधा पर अपनी लेखनी चलाकर अपना पांडित्य भी सिद्ध किया, पंजाबी लिपि ईजाद करके ब्राह्मणों की की सारी पंडिताई मिट्टी में मिला दी। अपनी आध्यात्मिक शक्ति और अपनी कुशाग्र बुद्धि भी दिखाई मगर ब्राह्मण पिछले गुजरे समय के पिछले अछूतों के भुलाबे में, गुरु रविदास जी को चमार समझ कर, उनसे पंगे लेकर, ब्राह्मण भरी सभाओं में, भरे राजदरबारों में जलील होते रहे, बुरी तरह से अपमानित होते रहे, बुरी तरह पराजित होते रहे मगर अपनी मक्कारी ना तब त्यागी, ना ही अब त्याग रहे।
गुरु रविदास जी ने, राग सिरी, गौउड़ी, वैरागनी, पूर्वी, आसा, गुजरी, रामकली, बिलाबल, मल्हार, सूही, गौंड, घनाक्षरी, सोरठी, रामकली चौउपदी, केदारा, मारू, रामकली चौपदी, भैरूउ, बसंत, आसाबरी, टोडी, सारंग, काहनड़ा, जैश्री, आदि रागों में, आध्यात्मिक शव्द, दो पद, पैंतीस अक्षरी, साँद वाणी, अनमोल वचन, शादी उपदेश, शादी लांवां, सुहाग उसतत, मंगलाचरण, अनमोल वचन, ओंकार सतनाम, ब्रह्म बूंद, एकै नूर प्रभु का, एक ही माटी के सब भांडे, शव्द सूरत का मेल, सबै नाम एक ही प्रभु के, ईश्वर मिलन की जुगती, साधु की पहचान, जिंदगी अरु मौत, निष्काम कर्म की भावना, नेक कमाई, जात पात खंडन, ऊंच नीच कौन, ब्राह्मण वैश्य, क्षत्रीय सत्य वचन, वासनाओं का त्याग, संतोष और त्याग, सच्चा प्रेम, सुख-दुख, श्रेष्ठ मार्ग, सच्चा उपदेश, सच्ची सेवा, बेगमपुरा, मांसाहारी नरक अधिकारी, जीव हत्या, पराधीनता, कटु वचन, शुद्र कौन, हिन्दू मुस्लिम दोस्त, वाणी हफ्तावार, वाणी पन्द्रां तिथां, विवाह शादी नियम, वाणी क्रांतिवीर, बारह मासा, चंपू काव्य (गद्य पद्य) आदि असंख्य विधाओं पर लिखकर इतिहास बनाया था मगर इससे भी उच्च रचना जो विश्व केलिये "आदिधर्म ग्रँथ" रचा था, वह था "पोथी साहिब" जिसका लक्ष्य था, विश्व में भूमण्डलीय सरकार की स्थापना केलिये, विश्व धर्म ग्रँथ बनाकर, धार्मिक और विद्वेष पूर्ण राजनैतिक संघर्षों को समाप्त करके, सत्य, और समरसतापूर्ण, जीवन जीने का मार्ग प्रशस्त करना था मगर गुरु रविदास जी के परिनिर्वाण के होते ही, ब्राह्मणों ने गुरु रविदास जी के सम्पूर्ण क्रांतिकारी साहित्य को जलाकर, राख कर दिया था,
उनकी शैली में उपलब्ध केवल चालीस शव्द ही मिलते हैं, जो सिखों के पास, गुरु नानकदेवजी ने संभाल कर रखे थे, बाकी कुछ अंश मात्र साहित्य, जो उनके शिष्यों को मौखिक रूप से याद रहा था, उसी को संकलित किया गया है, ये वाणी केवल गुरु जी के, भावों के अनुसार ही समझी जाती है, मगर गुरु रविदास जी की, मौलिक रचनाओं से हूबहू साम्य नहीं रखतीं हैं। मूलनिवासी साहित्यकारों ने, गुरु रविदास जी के कुछ ही अंशों के बारे में वर्णन किया है, जो अधूरा ही है, पूर्ण सत्य नहीं है।
।। सोहम।।जय गुरुदेव।।
रामसिंह शुक्ला।
अध्यक्ष।
विश्व आदिधर्म मंडल।
2मई 2020।

Comments

Popular posts from this blog

गुरु रविदास जी की क्रांतिकारी वाणी दोधारी है।

क्रांतिकारी शूरवीर गुरु रविदास जी महाराज।।

उत्तर प्रदेश में चल रहा बुलडोजर।