चँवर वंश का अंतिम योद्धा।। भाग 9।।
।।चँवर वंश का अंतिम वीर योद्धा भाग ।।9।।
बादशाह सिकंदर लोधी गुरु रविदास महाराज को राज पाठ और पीर, पैगंबर का दर्जा देता रहा मगर गुरु रविदास जी महाराज ने उस के दोनों ही पदों को ठुकरा दिया, उन्होंने यह साफ कह दिया कि:----
आद से प्रगट भयो जा कोउ ना कु अंत।
आद धर्म रविदास का जानै बिरला संत।।
मैं आदि धर्म को छोड़ कर के इस्लाम धर्म को कतई स्वीकार नहीं कर सकता हूँ, तू चाहे मेरा सिर कलम दे, यह सुन कर बादशाह सिकंदर लोधी वहुत परेशान हो गया था।
बादशाह सिकन्दर लोधी जर्जर:--- आज तक बादशाह सिकन्दर लोधी ने तोपों और तलवारों से युद्ध जीते थे मगर आज वह गुरु रविदास जी महाराज के अभेद्य शब्द रूपी मिसाइलों से बुरी तरह जर्जर और घायल हो कर टूट चुका था। गुरु रविदास जी बादशाह सिकंदर लोदी की दयनीय स्थिति को देखते हुए, फिर प्रहारों के ऊपर प्रहार करते ही गए और कहते हैं कि दींन और मजहब दोनों ही महामूर्ख मींडे हैं, जो आकारण आपस में एक दूसरे के साथ लड़भिड़ कर अपना खून बहाते हैं, फिर भी इन को कोई भी वीर, वहादुर, शूरवीर नहीं कहता है। बुद्धिमान लोग दोनों को ही कानों से पकड़ कर के दूर-दूर ले जाते हैं तभी इन का झगड़ा खत्म होता है। दीन और मजहब दोनों ही नए नवीने अवतार हैं, इन का मालिक एक मात्र आदि पुरुष ही है, इसलिए तू भी इन झगड़ों को छोड़ कर के केवल एक आदि पुरुष का ध्यान लगाने के लिए *सोहम* शब्द का जाप किया कर और इन दीन धर्मों के झंझट को छोड़ कर इन के सिरों में राख डाल दे, क्यों कि केवल एक ईश्वर का नाम ही सर्वश्रेष्ठ है🥦
।।शब्द।।
दीन मजहब दोनों हन मींडे भीड़त ना होवण सूर।
आरफ लोग दोहाँ दे मध चों कंन फ़ड़ होवन दूर।१।
दीन मजहब दोनो है नए नवीने ईश नाम है आदि।
दीन मजहब के झगड़े छोड़ के ईश नाम कर याद।२।
सिआह मुख छड मजहब को नील मुख छड दीन।
छार दोहाँ सिर दे बिच पाईऐ ईश है नाम परवीन।३।
गुरु रविदास ने जीवन मूल्य समझाए:---गुरु रविदास जी महाराज ने क्रूर तानाशाह बादशाह सिकंदर लोधी को जीवन के वास्तविक मूल्यों, रहष्यों को समझा कर धर्मों की लड़ाई के बारे में बता कर, इस्लाम धर्म को अस्वीकार कर दिया, तब वह पागल हो गया और क्रोध में जलता हुआ तंदूर की तरह अंदर से लाल हो गया था। वह गुरु जी के शब्द बाणों से आहत हो कर कहने लगा, कि आप ने अल्लाह की निंदा की है, इसलिए मैं इस्लाम धर्म के अपमान करने के गुनाह के लिए आप को वैसे ही उठा लूँगा, जिस प्रकार नदी के पानी के ऊपर से बूर को उठाया जाता है। मैं आप को कारागार में डाल कर सारी उम्र कैद में ही गुजारने के लिए विवश कर दूंगा या मंसूर की तरह सूली पर चढ़ा दूंगा। सिकंदर लोदी ने गुरु रविदास जी के हाथों में कड़ियां लगवा दीं और पैरों में बेड़ियां डाल कर के जेठ मास की भीष्ण गर्मी में आग की तरह धधकती हुई तुगलकाबाद जेल में बंद कर दिया।
।। शाह सिकन्दर।।
आ गया क्रोध दे बिच लोधी तप गिआ अंदरों तंदूर बांगूं।।
ईश निंदिआ दीन इसलाम तांई चक दऊँ पाणीऊँ बूर बांगूं।।
बिच कैद दे उमर गुजार छडूं नहीं मार देऊँ सूली मंसूर बाँगूं।।
पैर लाई बेड़ी हथ लाई कड़ीआं कहा बैठिआ तखते सूर बाँगूं।।
गुरु रविदास ने जेल स्वीकार कर ली:--- गुरु रविदास जी महाराज ने क्रूर तानाशाह बादशाह सिकंदर लोदी का अहंकार तोड़ने के लिए दिल्ली स्थित तुगलकाबाद जेल में जाना स्वीकार कर लिया और भारतवर्ष के हिंदू लोगों के कतल बंद करने के लिए आत्म बलिदान देने के लिए, शीश तक काटने के लिए कह दिया। सभी हिंदुओं को बचाने के लिए उन्होंने अपनी जान को हथेली पर रख कर बादशाह सिकंदर लोधी को खरी खोटी सुना कर, उसे सोच विचार करने के लिए विवश कर दिया।
गुरु रविदास सामना ना करते तो धर्म खतरे में पड़ जाते:-- यदि गुरु रविदास जी महाराज, बादशाह सिकंदर लोदी का डट कर सामना नहीं करते तो भारतवर्ष में कोई भी धर्म सुरक्षित नहीं रह सकता था मगर इन धर्म के ठेकेदारों ने गुरु रविदास जी महाराज की दिव्य शक्ति का लाभ उठाने के लिए ये लिखा है, कि गुरु जी ने छाती चीर कर चार युगों के सोने, चांदी, ताँबे और धागे के जनेऊ निकाले थे, जब कि ये तर्क और सत्य से परे की झूठी कथा है।( उस समय मूलनिवासी लोगों को पढ़ने लिखने का कोई अधिकार नहीं था, लिखने का काम केवल ब्राह्मण ही करते थे इसलिए ब्राह्मणों ने गुरु रविदास जी के बारे में सच्ची झूठी कथाएं लिख कर के गुरु रविदास जी के वंशजों को भ्रमित किया है, जिन पर किसी को भी विश्वास नहीं करना चाहिए और अपने दिमाग से रचनात्मक दृष्टि से अर्थ निकालने का प्रयास करना चाहिए) गुरु जी ने अपना खून निकाल कर तो अवश्य ही दिखाया होगा, कि देखो हिंदू मनुवादियों! मेरा और आप का खून एक जैसा लाल है, जिस में कोई अंतर नहीं है, फिर तुम मेरे लोगों के साथ छुआछूत क्यों करते हो? मगर इन स्वार्थी, पाखण्डी और ढोंगी लोगों ने, गुरु रविदास जी महाराज के मान, सम्मान को ठेस अवश्य पहुँचाई है। उन्हें गन्दे जूतों की मुरम्मत करते हुए, रंबी से छाती चीरते हुए उन की भद्दी और काल्पनिक तस्वीरें, चित्र बना कर दिखाया हुआ है, जब कि गुरु रविदास जी दिन रात घूम घूम कर जनता को सामाजिक बुराईयों को छोड़ कर आपस में प्रेम प्यार सहित मधु मक्खियों की तरह जीवन जीने का सत्सङ्ग देते रहते थे, वे तो आज यहाँ और कल वहाँ चलते ही रहते थे, फिर आप अनुमान लगा सकते हो कि बाबन राजाओं और बादशाहों के गुरु किसी के जूतों की मुरम्मत कर सकते थे? इस प्रकार के दृश्य दिखाने तत्काल बन्द किए जाने चाहिए, अन्यथा हम भी दूसरे देवी देवताओं को भी ऐसा करते हुए भिन्न भिन्न प्रकार की तस्वीरें और चित्र तैयार करेंगे।
राम सिंह आदवंशी।
अध्यक्ष,
विश्व आदि धर्म मंडल।
हिमाचल प्रदेश।
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