आदधर्म मंडल बनाम महात्मा गांधी।।
।।आदधर्म मंडल बनाम महात्मा गांधी।।
आदधर्म मंडल ही सत्य की लड़ाई लड़ रहा था। आदधर्म मंडल ही प्रकृति के नियमों के अनुसार जीवनयापन करने का मार्ग प्रशस्त करता आया है और दूसरों को भी कराता आया है। अहिंसा और सत्य के सिद्धांतों के अनुसार ही जीने की राह बताता है और बताता आया है और खुद भी इसी मार्ग पर चलता आया है मगर पाँच हजार सालों से इस सिद्धांत को ग्रहण लगा हुआ है। मूलनिवासी भारत के शासक कोई सेना पुलिस नहीं रखते थे, कोई भी व्यक्ति चोरी, लूटपाट, बदमाशी और ठगी नहीं करते थे मगर जब से विदेशी यूरेशियन भारत में घुसे हैं तभी से ही यहाँ ये सर्वस्व घटने लगा हुआ है। मुस्लिम शासकों ने भारत को जी भर कर लूटा, अंग्रेजों ने भारत का सारे का सारा कच्चा माल इंग्लैंड ले जाकर पक्का कर के बेचा, इन्हीं की संतानों ने भारत के सच्चे सुच्चे शासकों को धोखेबाजी से अपना गुलाम बनाया और हम मूलनिवासियों को ही सत्य और अहिंसा का पाठ पढ़ाया। महात्मा गांधी तो मानो सत्य, सत्याग्रह और अहिंसा का काल्पनिक अवतार ही था।
गांधी के अनुसार सत्याग्रह क्या है:---महात्मा गांधी का मानना था कि हर व्यक्ति के अंदर सत्य का अंश होता है और उस को सत्य का आभास होता है, अहिंसा के मार्ग पर चल कर असत्य पर बुराई का विरोध करना ही सत्याग्रह है, गांधी के ही इस कथन का विश्लेषण किया जाए तो उस की करनी और कथनी के बीच धरती आसमान का फर्क नजर आता है।
जब साहिबे कलाम मंगू राम मुगोवाल जी ने, सत्य पर चल कर अमीर-गरीब, ऊँच-नीच, छूत अछूत, गोरे-काले, अवर्ण-सवर्ण की लड़ाई शुरू की थी, तभी गांधी ने इन सब सिद्धांतो को छोड़ कर केवल मात्र यूरेशियन लुटेरों की छद्म लड़ाई, लड़नी शुरू की थी। बाबू मंगू राम मुगोवालिया सभी जातियों के लिए रोटी, कपड़े और मकान के लिये संघर्ष कर रहे थे, जिसे तवाह करने के लिए, गांधी नित नए सत्याग्रह शुरू कर रहा था। आदधर्म मंडल के मानवतावादी आंदोलन को दबाने और कुचलने के लिए 12 मार्च 1930 को नमक सत्याग्रह शुरू किया था मगर जो बराबरी, समानता, गुलामी मिटाने का सत्याग्रह आदधर्म मंडल चला रहा था, जिस से ब्रिटिश सरकार भी सहमत थी, उस को दबाने के लिए गांधी ने नया पैंतरा चलाया और नमक के टैक्स का बहाना बना कर, आदधर्म मंडल की तीव्र आवाज को गुमनाम करने का नाटक शुरू किया था, आज आजाद भारत की सरकार भी टैक्स थोंप थोंप कर नमक भी बीस तीस रुपये किलो बेच रही है, क्या अब भी कोई नमक के खिलाफ आंदोलन चला रहा है? क्या नमक पानी से मुफ्त ही नहीं मिलता है? क्या समुन्दर से निकलने वाला यही नमक सस्ता नहीं बिक सकता है? सन 1930 में मूलनिवासियों को दो बोट, आरक्षण, भू मालिक बनने की बात चल रही थी, जिसे दबाने के लिए ही गांधी ने अपने ही मॉडल के छद्म सत्याग्रह को आरंभ कर दिया था। कितना विरोधाभास था, इस सत्याग्रह के काल्पनिक पुजारी का। यह सत्य का पुजारी केवल सवर्णों के लिए ही सभी मूलनिवासियों के अधिकारों को छीनने का ढोंग रच कर, गरीब मजलूम लोगों की बलि देने का छद्म आंदोलन चला रहा था।
आदधर्म मंडल चाहता था कि, सभी को मौलिक अधिकार मिलें, सभी जमीन के मालिक बन कर खुद अनाज पैदा कर के जीवनयापन करें, कोई किसी का मताहूआ ना रहे, कोई किसी का भी स्वामी ना रहे, कोई अमीर सेठ ना रहे, कोई छूत अछूत ना रहे। सभी भारतवर्ष में रहने वालों को नागरिकता के अधिकार मिलें, गरीब ,मजलूमों को पुलिस, मिलिट्री और कारखानों में भर्ती कर के रोजगार दिया जाए, मेधावी छात्रों को शिक्षा अर्जित करने के लिए बजीफे दिए जाएं, मगर गांधी तो ऐसे इशू कभी नहीं उठाता था, कभी गरीबों के लिए मरण व्रत नहीं रखता था, काम कर रहा था कि, डॉक्टर भीमराव अम्वेदकर को ब्रिटिश सरकार अपनी कौंसल से तत्काल बाहर करे ताकि वह किसी मूलनिवासी को रोजगार ना दिला सके।
इतना ढोंग रचाने वाले महात्मा के साथ एमसी राजा, बाबू जगजीवनराम आदि स्वार्थी नेता उस के कंधे से कंधा मिला कर, अपने आदधर्म मंडल आंदोलन को बुरी तरह से कुचल रहे थे, जिस के क्रांतिकारी आंदोलन से अछूत मूलनिवासियों को मिलने वाले अधिकार थे, जो खटाई में पढ़ते रहे। वहुजन समाज के स्वार्थी राजनेताओं की मूर्खता के परिणाम, वहुजन समाज भुगतता आ रहा है। ना जाने इन भूले भटके लोगों को कब अक्ल आएगी।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।
मार्च 27, 2021।
Comments
Post a Comment